देहरा तिजारा स्थित श्री 1008 चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में अष्टानिका महापर्व पर आयोजित धर्मसभा में श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महाराज ने समभाव, तप, त्याग और आत्मकल्याण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि दुःख को सहन करने वाला ही शाश्वत सुख और मोक्षमार्ग का अधिकारी बनता है। पढ़िए श्रीफल साथी सोनल जैन की यह रिपोर्ट।
देहरा तिजारा (अलवर)। पावन अष्टानिका महापर्व के अवसर पर श्री 1008 चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में आयोजित विशाल धर्मसभा में परम पूज्य श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य का वास्तविक सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि दुःख को समभावपूर्वक सहन करने की क्षमता में निहित है।दुःख आत्मा को बनाता है मजबूत
महाराज श्री ने भगवान महावीर के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में आने वाले कष्ट और संघर्ष आत्मा को तोड़ने नहीं, बल्कि उसे मजबूत और निर्मल बनाने के लिए आते हैं। जो व्यक्ति धैर्य, संयम और समता के साथ विपरीत परिस्थितियों का सामना करता है, वही अंततः स्थायी और वास्तविक सुख का अनुभव करता है।
तप और त्याग से मिलता है आत्मकल्याणअपने प्रवचन में आचार्य श्री ने माँ के त्याग का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे एक माँ संतान के सुख के लिए प्रसन्नतापूर्वक कष्ट सहन करती है, वैसे ही आत्मा के अनंत सुख की प्राप्ति के लिए तप, त्याग और कठिनाइयों को स्वीकार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अग्नि में तपकर ईंट मजबूत बनती है और मिट्टी का घड़ा उपयोगी बनता है, उसी प्रकार तप से आत्मा कर्मों का क्षय कर अपने स्वाभाविक गुणों को प्रकट करती है।
समभाव से ही खुलता है मोक्षमार्गआचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन की प्रत्येक विपरीत परिस्थिति को आत्मकल्याण का अवसर मानें। जो व्यक्ति समभावपूर्वक दुःख सहना सीख लेता है, वह आत्मिक उन्नति करते हुए मोक्षमार्ग का अधिकारी बनता है।
समाजजनों की रही गरिमामयी उपस्थितिधर्मसभा में मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंब्बू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन (पटेल), नीरज जैन (कालू), टीटू जैन, संजय जैन, ललित जैन, कुसुम जैन, चाँदनी जैन, सविता जैन, अमृता जैन, मीनू जैन, इंद्रा जैन, सुमन जैन, प्रियंका जैन एवं निशु जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। धर्मसभा का वातावरण भक्ति, श्रद्धा और आत्मचिंतन से ओत-प्रोत रहा।
धर्म और संयम का लिया संकल्पप्रवचन के उपरांत श्रद्धालुओं ने धर्म, संयम, तप और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया तथा अष्टानिका महापर्व की आराधना को जीवन में उतारने का संकल्प व्यक्त किया।




