सिद्धि: प्रासादनि: श्रेणी पंक्तिवत् भव्यदेहिनाम्।

दशलक्षण धर्मोऽयं, नित्यं चित्तं पुनातु न:।।

अर्थात् भव्यजीवों के सिद्धिमहल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की पंक्ति के समान यह दशलक्षण धर्म नित्य ही हम लोगों के चित्त को पवित्र करे।

दशलक्षण पर्व आत्मशुद्धि का पर्व है। यह हमें अपने भीतर झांकने और क्रोध, मान, माया, लोभ जैसी कषायों को छोड़ने का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है। असंयम से संयम की ओर बढ़ने का पुरुषार्थ करना और यह याद रखना कि आत्मा के अलावा मेरा वास्तव में कुछ भी नहीं है—यही इस पर्व का मूल संदेश है।

इस पर्व में उत्तम क्षमा आदि दस धर्मों की पूजा-अर्चना करते हुए जिनेंद्र भगवान की आराधना की जाती है। साथ ही उपवास और अपनी शक्ति के अनुसार त्याग करने की परंपरा भी चली आ रही है। इन साधनाओं का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन को विषयों और विकारों से दूर कर आत्मा की ओर ले जाना है।

दशलक्षण पर्व हमें यह भी सिखाता है कि व्यक्ति की पहचान उसके पद, प्रतिष्ठा या पैसे से नहीं, बल्कि उसके गुणों से होती है। क्षमा, विनम्रता, सरलता, सत्य, संयम और त्याग जैसे गुण ही व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।

यह पर्व संसार में रहते हुए धर्म के साथ जीवन जीने की कला सिखाता है और साथ ही संसार के बंधनों से ऊपर उठकर मोक्ष की ओर बढ़ने का मार्गदर्शन करता है।

यह यात्रा उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य के दस पड़ावों से गुजरते हुए आत्मकल्याण और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ती है।

आइए, जानते हैं दशलक्षण पर्व को—इसके दस धर्मों को, इनके जीवन में महत्व को और उस मार्ग को, जो हमें बाहर की दुनिया से भीतर की आत्मा की ओर ले जाता है।

दशलक्षण पर्व क्यों?

यह पर्व स्वयं को देखने का अवसर है।

मनुष्य अपने भीतर झांके और देखे—

क्रोध कितना है?

अहंकार कितना है?

कपट कितना है?

लोभ कितना है?

इच्छाएं कितनी हैं?

और आत्मसंयम कितना है?

दशलक्षण के दस धर्म इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने की दिशा देते हैं।

साथ ही यह पर्व हमें सिखाता है—

क्रोध को क्षमा में बदलना है।

अहंकार को विनम्रता में बदलना है।

कपट को सरलता में बदलना है।

लोभ को शुचिता में बदलना है।

असंयम को संयम में बदलना है।

दशलक्षण और पर्यूषण : नाम में ही छिपा पर्व का सार

उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य—इन दस धर्मों की विशेष आराधना की जाती है। इसी कारण इसे दशलक्षण पर्व कहा जाता है।

‘परि समन्तात् ऊषन्ते दह्यन्ते पापकर्माणि यस्मिन् तत् पर्यूषणम्।’

अर्थात् जिस साधना के माध्यम से पापकर्मों का क्षय होता है, आत्मधर्म जागृत होते हैं और आत्मा के गुण प्रकट होते हैं, उसे पर्यूषण कहा जाता है।

‘पर्व’ का अर्थ गांठ या ग्रंथि भी माना गया है। मन में बंधी कषाय, मोह, राग-द्वेष और ममत्व की गांठों को पहचानकर उन्हें खोलने की कला सिखाने वाला पर्व ही पर्यूषण पर्व है।

वर्ष में तीन बार आता है, भाद्रपद में विशेष महत्व

दशलक्षण पर्व वर्ष में तीन बार आता है। पहला चैत्र शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक, दूसरा भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक और तीसरा माघ शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है। हालांकि तीनों अवसरों का धार्मिक महत्व है, लेकिन भाद्रपद में आने वाले दशलक्षण पर्व की विशेष धार्मिक मान्यता और व्यापकता देखने को मिलती है।

त्रैकालिक और शाश्वत पर्व

दशलक्षण पर्व को त्रैकालिक, शाश्वत तथा अनादि-अनिधन पर्व कहा जाता है। इसका संबंध किसी व्यक्ति विशेष या किसी एक ऐतिहासिक घटना से नहीं, बल्कि काल परिवर्तन की शाश्वत प्रक्रिया से है। यह परिवर्तन अनादि काल से होता आया है और अनंत काल तक चलता रहेगा। इसी कारण दशलक्षण पर्व किसी एक समय या काल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी प्रासंगिकता तीनों कालों—भूत, वर्तमान और भविष्य—में सदैव बनी रहती है।

दस धर्म एक कल्पवृक्ष

दस धर्मों को एक कल्पवृक्ष के रूप में समझने की सुंदर परंपरा भी मिलती है।

क्षमा इसकी जड़ है।

मार्दव इसका तना है।

आर्जव इसकी शाखाएं हैं।

शौच इसका पोषण है।

सत्य इसके पत्ते हैं।

संयम, तप और त्याग इसके पुष्प हैं।

आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य इसकी सुंदर मंजरियां हैं।

यह धर्मरूपी कल्पवृक्ष अंततः आत्मकल्याण का फल देता है।

एक नजर में

दस धर्म, एक परिवर्तन

क्षमा — क्रोध घटाए

मार्दव — अहंकार घटाए

आर्जव — कपट मिटाए

शौच — लोभ घटाए

सत्य — वाणी शुद्ध करे

संयम — जीवन साधे

तप — आत्मा निखारे

त्याग — ममत्व घटाए

आकिंचन्य — ‘मेरा’ मिटाए

ब्रह्मचर्य — आत्मा में रमण कराए

दस धर्म, दस जाप

1. उत्तम क्षमा जाप

ॐ ह्रीं उत्तम क्षमाधर्मांगाय नमः।

2. उत्तम मार्दव जाप

ॐ ह्रीं उत्तम मार्दवधर्मांगाय नमः।

3. उत्तम आर्जव जाप

ॐ ह्रीं उत्तम आर्जवधर्मांगाय नमः।

4. उत्तम शौच जाप

ॐ ह्रीं उत्तम शौचधर्मांगाय नमः।

5. उत्तम सत्य जाप

ॐ ह्रीं उत्तम सत्यधर्मांगाय नमः।

6. उत्तम संयम जाप

ॐ ह्रीं उत्तम संयमधर्मांगाय नमः।

7. उत्तम तप जाप

ॐ ह्रीं उत्तम तपधर्मांगाय नमः।

8. उत्तम त्याग जाप

ॐ ह्रीं उत्तम त्यागधर्मां

गाय नमः।

9. उत्तम आकिंचन्य जाप

ॐ ह्रीं उत्तम आकिंचन्यधर्मांगाय नमः।

10. उत्तम ब्रह्मचर्य जाप

ॐ ह्रीं उत्तम ब्रह्मचर्यधर्मांगाय नमः।