श्रीफल की विशेष श्रृंखला में आज मिलिए खरगोन के अजीत जैन, विद्या जैन और पुत्र सोहिल जैन के परिवार से। दशलक्षण में परिवार की सुबह प्रभु दर्शन, अभिषेक, पूजन और विधान से शुरू होती है। शाम आरती और प्रवचन के नाम रहती है। परिवार के सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार एकासन और उपवास भी करते हैं।

दशलक्षण के दस दिनों में किसी परिवार की दिनचर्या कितनी बदलती है और घर के धार्मिक संस्कार बच्चों की अपनी साधना कैसे बनते हैं? इन्हीं सवालों को लेकर श्रीफल साथी सन्मति जैन काका ने अजीत जैन से बातचीत की।

पहले अभिषेक-पूजन और विधान, फिर भोजन

अजीत जैन बताते हैं कि परिवार सामान्य दिनों में भी धर्म से जुड़ा रहता है, लेकिन दशलक्षण में पूजा-पाठ, तप और संयम के लिए समय बढ़ जाता है।

सुबह परिवार के सदस्य मंदिर पहुंचकर प्रभु दर्शन, अभिषेक, पूजन और विधान करते हैं। इसके बाद ही भोजन किया जाता है। इन दस दिनों में सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार एकासन और उपवास के नियम भी लेते हैं।

शाम को परिवार फिर आरती और प्रवचन से जुड़ जाता है। इस तरह सुबह से शाम तक धार्मिक क्रियाएं दशलक्षण की दिनचर्या का प्रमुख हिस्सा बन जाती हैं।

घर के संस्कार बने सोहिल की अपनी साधना

परिवार से मिले धार्मिक संस्कार पुत्र सोहिल जैन की साधना में भी दिखाई देते हैं। नौकरी के कारण बाहर रहने के बावजूद उन्होंने धर्म से अपना जुड़ाव बनाए रखा है।

वर्ष 2024 के दशलक्षण पर्व में महाराष्ट्र के नांदणी में आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में सोहिल जैन ने दस उपवास की साधना पूरी की।

सोहिल पिछले करीब पांच वर्षों से धार्मिक तीर्थयात्राओं के आयोजन से भी जुड़े हैं। परिवार के अनुसार अब तक करीब 366 यात्रियों को सम्मेद शिखर सहित विभिन्न तीर्थों की यात्रा से जोड़ चुके हैं।

साधु सेवा से भी जुड़ा है परिवार

परिवार में साधु-संतों की सेवा का भाव भी शुरू से रहा है। खरगोन में साधु-संतों के आगमन पर अजीत और सोहिल जैन आगवानी तथा आहार व्यवस्था में सहयोग करते हैं। विद्या जैन भी मुनि संघ की आहार व्यवस्था से जुड़ी रहती हैं।

अजीत जैन मुनि सेवा समिति, खरगोन के माध्यम से भी धार्मिक व्यवस्थाओं और मुनि सेवा में सहयोग करते हैं।

दस दिन—जब घर के संस्कार बनते हैं अपनी साधना

अजीत जैन परिवार की दिनचर्या बताती है कि दशलक्षण में केवल पूजा का समय नहीं बढ़ता, बल्कि तप और संयम भी बढ़ता है। सुबह अभिषेक-पूजन और विधान, अपनी क्षमता के अनुसार एकासन-उपवास तथा शाम को आरती-प्रवचन—यही इन दस दिनों की दिनचर्या है।

परिवार में वर्षों से चले आ रहे संस्कारों का असर अगली पीढ़ी में भी दिखाई देता है। सोहिल के दस उपवास इसकी एक मिसाल हैं कि घर में देखा धर्म आगे चलकर बच्चों की अपनी साधना बन सकता है।

श्रृंखला का उद्देश्य

श्रीफल की विशेष ‘दशलक्षण और निमाड़ के परिवार’ श्रृंखला में हम हर दिन एक परिवार से जान रहे हैं कि दशलक्षण के दस दिनों में उनकी दिनचर्या, तप-त्याग और धर्म-साधना में क्या बदलाव आता है।

कल फिर मिलेंगे निमाड़ के एक और परिवार से और जानेंगे उनके दशलक्षण के दस दिनों की दिनचर्या।