श्रीफल की विशेष श्रृंखला में आज मिलिए बेड़िया के नरेंद्र कुमार जटाले परिवार से, जहां दशलक्षण पर्व आते ही परिवार का हर सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार त्याग, तप, सामायिक, प्रतिक्रमण और संयम के नियमों से जुड़ जाता है। श्रीफल के लिए श्रीफल साथी सन्मति जैन काका ने नरेंद्र कुमार जटाले से बातचीत कर उनके परिवार की दस दिनों की दिनचर्या को जाना।

दशलक्षण पर्व के दस दिन परिवार के हर सदस्य के लिए एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं। कोई उपवास कर सकता है, कोई एकासन, कोई सामायिक और प्रतिक्रमण तो कोई अपनी परिस्थितियों के कारण केवल रात्रि भोजन का त्याग कर सकता है। लेकिन इन सबको जोड़ने वाली एक चीज है—धर्म के प्रति श्रद्धा।

बेड़िया निवासी नरेंद्र कुमार जटाले के परिवार में भी इन दस दिनों की कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखाई देती है।

श्रीफल साथी सन्मति जैन काका से बातचीत में नरेंद्र कुमार जटाले कहते हैं, “श्रद्धा से बड़ा कुछ नहीं होता, यह हमने अपने गुरुओं से सीखा है।”

गुरुओं के मार्गदर्शन ने बदली जीवनचर्या

नरेंद्र कुमार जटाले बताते हैं कि उनके परिवार को आचार्य श्री वर्धमानसागर महाराज और आचार्य श्री प्रज्ञासागर महाराज का आशीर्वाद और मार्गदर्शन मिला है। गुरुओं से मिले इन्हीं संस्कारों ने धीरे-धीरे परिवार की जीवनचर्या को धर्म और संयम से जोड़ा।

सामान्य दिनों में भी परिवार धार्मिक नियमों से जुड़ा रहता है, लेकिन दशलक्षण आते ही नियम और बढ़ जाते हैं। कोई तप करता है, कोई त्याग करता है, कोई सामायिक-प्रतिक्रमण करता है तो कोई पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रमों में अधिक समय देता है।

नरेंद्र जी कहते हैं कि इन दस दिनों में परिवार का हर सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ नियम जरूर लेता है।

पत्नी पुष्पाबाई के संस्कारों में त्यागी परिवार की छाप

नरेंद्र जी अपनी धर्मपत्नी पुष्पाबाई की दिनचर्या का जिक्र करते हुए बताते हैं कि उनका आचार्य श्री वर्धमानसागर महाराज के गृहस्थ जीवन के परिवार से पारिवारिक संबंध रहा है। वे आचार्यश्री की गृहस्थ अवस्था की भतीजी हैं।

नरेंद्र जी के अनुसार परिवार और त्यागियों की परंपरा से मिले संस्कार पुष्पाबाई की दिनचर्या में आज भी दिखाई देते हैं। दशलक्षण के दस दिनों में वे विशेष रूप से सामायिक, जाप और धर्म-ध्यान में समय लगाती हैं।

बहू उपवास-एकासन से जोड़ती हैं खुद को

परिवार की बहू की शुरू से ही धार्मिक गतिविधियों में विशेष रुचि रही है। दशलक्षण पर्व में वे अपनी क्षमता के अनुसार उपवास और एकासन करती हैं।

नरेंद्र जी बताते हैं कि बहू के लिए यह केवल पर्व का नियम नहीं, बल्कि अपने जीवन को कुछ दिनों के लिए और अधिक संयमित करने का माध्यम है।

व्यापार के बीच बेटा निकालता है धर्म-ध्यान का समय

नरेंद्र जी का पुत्र व्यापार में व्यस्त रहता है। सामान्य दिनों में काम की जिम्मेदारियां अधिक रहती हैं, लेकिन दशलक्षण के दिनों में वह भी अपनी क्षमता के अनुसार धर्म-ध्यान के लिए समय निकालता है।

परिवार में किसी पर यह दबाव नहीं कि सभी एक जैसे नियम करें। भावना यही रहती है कि जिसकी जितनी क्षमता है, वह उतना त्याग और संयम अपने जीवन में उतारे।

पोता नौकरी के लिए बाहर, लेकिन रात्रि भोजन का त्याग नहीं छूटा

परिवार की अगली पीढ़ी में भी संस्कार दिखाई देते हैं। नरेंद्र जी का पोता नौकरी के कारण घर से बाहर रहता है। घर और परिवार से दूर होने के बावजूद वह दशलक्षण के दिनों में गुरु से मिले संस्कारों को नहीं भूलता।

वह अपनी परिस्थितियों के अनुसार धर्म के नियमों का पालन करता है और रात्रि भोजन का त्याग रखता है।

नरेंद्र जी के लिए यह संतोष की बात है कि बच्चे चाहे पढ़ाई, व्यापार या नौकरी के कारण घर से दूर हों, लेकिन धर्म और गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा उन्हें अपने नियमों से जोड़े रखती है।

मंदिर में तीनों समय प्रवचन, घर में भी धर्ममय माहौल

दशलक्षण के इन दिनों में परिवार मंदिर में होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों से भी जुड़ा रहता है। मंदिरजी में विद्वान भैयाजी के तीनों समय होने वाले प्रवचनों का परिवार लाभ लेता है।

पूजा, अभिषेक, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप और त्याग—इन सबके कारण दस दिनों में घर से मंदिर तक का वातावरण धर्ममय हो जाता है।

थाली भी बदल जाती है, कंद-मूल और हरी सब्जियों का त्याग

दशलक्षण में केवल दिनचर्या ही नहीं, भोजन में भी बदलाव आता है। परिवार कंद-मूल और हरी पत्तेदार सब्जियों का त्याग करता है। कोई उपवास करता है, कोई एकासन तो कोई बियासन के नियम लेता है।

नरेंद्र जी कहते हैं कि नियम सभी के अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उसके पीछे भावना एक ही है—जितना संभव हो, अपनी इच्छाओं को सीमित करें और धर्म-आराधना के लिए अधिक समय निकालें।

केवल भोजन का नहीं, क्रोध-मान-माया-लोभ का भी हो त्याग

दस दिनों की दिनचर्या बताते-बताते नरेंद्र जी एक ऐसी बात कहते हैं, जो इस पर्व को केवल खान-पान के नियमों से आगे ले जाती है।

उनका कहना है कि दशलक्षण में हमारा प्रयास केवल भोजन की कुछ चीजों को छोड़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों को कम करना भी वास्तविक त्याग है।

किसी के प्रति मन में द्वेष न रखें। अपनी गलती के लिए क्षमा मांगें और जिसने हमारे साथ कुछ गलत किया हो, उसे भी हृदय से क्षमा करने का भाव रखें।

दस दिन—हर सदस्य का नियम अलग, लेकिन भावना एक

नरेंद्र कुमार जटाले परिवार की दस दिनों की दिनचर्या में कोई उपवास कर रहा है, कोई एकासन, कोई सामायिक-जाप तो कोई व्यापार और नौकरी के बीच रात्रि भोजन का त्याग निभा रहा है।

नियम अलग हैं, परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन सभी को जोड़ने वाली डोर एक है—गुरुओं से मिली श्रद्धा और परिवार से मिले संस्कार।

नरेंद्र जी की मंगल भावना भी यही है कि परिवार में धर्म की भावना और प्रबल हो, सुख-शांति बनी रहे और जीवन संयम तथा सद्मार्ग की ओर लगातार आगे बढ़ता रहे।

श्रृंखला का उद्देश्य

श्रीफल की विशेष “दशलक्षण और निमाड़ के परिवार” श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, आम दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा पर्व का परिवार और जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।

कल मिलेंगे निमाड़ के एक और परिवार से और जानेंगे कि दशलक्षण पर्व के दस दिनों में उनके घर की दिनचर्या कैसे बदलती है और परिवार का हर सदस्य अपने जीवन में कौन-सा नियम जोड़ता है।