इंदौर में एकासन और दिनभर स्वाध्याय-सामायिक, अमेरिका में बेटा-बेटी का परिवार भी कर रहा पूजन-विधान; पांच साल की नातिन भी करती है भोजन में त्याग
श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दस दिन–दस परिवार’ में आज जानिए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तीर्थ संरक्षिणी महासभा टी.के. वेद और उनके परिवार की दशलक्षण दिनचर्या।
दशलक्षण महापर्व के दस दिन टी.के. वेद के लिए सामान्य दिनों से बिल्कुल अलग होते हैं। इन दिनों व्यापार और दूसरी गतिविधियों को विराम देकर उनका पूरा समय धर्म-साधना में बीतता है। सुबह साढ़े चार बजे से शुरू होने वाली दिनचर्या में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, स्वाध्याय, धार्मिक कक्षाएं और सामायिक शामिल हैं। भोजन में भी विशेष संयम रखते हुए वे चौबीस घंटे में केवल एक बार एकासन करते हैं।
श्रीफल समूह की समूह संपादक रेखा जैन से विशेष बातचीत में टी.के. वेद ने बताया कि दशलक्षण के दौरान वे श्रावक संस्कार शिविर से जुड़े हुए हैं। सुबह करीब साढ़े चार बजे वहां पहुंच जाते हैं। दिन की शुरुआत योग से होती है। इसके बाद अभिषेक, शांतिधारा और पांच पूजाओं का क्रम रहता है। इन दस दिनों में उनका प्रयास रहता है कि अधिक से अधिक समय धर्म को समझने और स्वयं के भीतर उतरने में लगाया जाए।
24 घंटे में एक बार भोजन, हरी सब्जी का भी त्याग
दशलक्षण के दस दिनों में टी.के. वेद एकासन का नियम निभा रहे हैं। चौबीस घंटे में एक बार भोजन करते हैं और उसी समय पानी भी लेते हैं। भोजन में भी उन्होंने विशेष मर्यादा रखी है। हरी सब्जियों का पूरी तरह त्याग है और भोजन में केवल दाल-रोटी जैसी सीमित सामग्री लेते हैं।
रेखा जैन से बातचीत में उन्होंने बताया कि इन दस दिनों में जितना संभव हो, भोजन को भी सीमित रखा जाता है। उद्देश्य केवल एक समय भोजन करना नहीं, बल्कि स्वाद और विकल्पों को कम करके संयम को जीवन में उतारना है।
दिन में तीन कक्षाएं, शाम को सामायिक
पूजा के बाद टी.के. वेद का समय धार्मिक अध्ययन में बीतता है। दिनभर में आचार्यश्री की अलग-अलग विषयों पर चलने वाली कक्षाओं में वे शामिल होते हैं। द्रव्यसंग्रह, आलोचना और तत्त्वार्थसूत्र जैसे विषयों का अध्ययन किया जा रहा है। शाम करीब साढ़े चार बजे तक अध्ययन का क्रम चलता है और इसके बाद सामायिक करते हैं।
इन दस दिनों में उन्होंने घर और मंदिर के अलावा गैर-जरूरी बाहर के काम लगभग बंद कर दिए हैं। आवश्यक धार्मिक कार्यक्रम हो तो उसमें शामिल होते हैं, लेकिन व्यापार या दूसरी सामान्य गतिविधियों में समय नहीं देते। उनके शब्दों में इन दस दिनों का नियम है—‘नो बिजनेस, नो दूसरी एक्टिविटी, सिर्फ धर्म।’
हजारों किलोमीटर दूर भी बच्चों की दिनचर्या में वही संस्कार
टी.के. वेद परिवार की खास बात यह है कि दशलक्षण के नियम केवल इंदौर तक सीमित नहीं हैं। उनके बेटा-बेटी और परिवार के अन्य सदस्य अमेरिका में रहते हुए भी अपनी परिस्थिति के अनुसार पर्व की मर्यादा निभा रहे हैं।
बातचीत में टी.के. वेद ने बताया कि बच्चों ने वहां मंदिर में सोलह कारण विधान किया। वे पूजन, अभिषेक और शांतिधारा करते हैं तथा दशलक्षण में एकासन का नियम भी रखते हैं। आलू, प्याज और लहसुन का उपयोग नहीं करते। विदेश में व्यस्त दिनचर्या और मंदिर की दूरी के बावजूद धर्म-साधना का क्रम बनाए रखने की कोशिश रहती है।
मंदिर दूर होने के कारण सप्ताह के सामान्य दिनों में रोज वहां पहुंचना संभव नहीं होता। शनिवार और रविवार को मंदिर जाने का अवसर मिलता है, जबकि बाकी दिनों में घर पर ही पूजन, स्वाध्याय और सामायिक की जाती है।
पांच साल की बच्ची भी अपनी पसंद की चीज छोड़कर करती है त्याग
इस बातचीत का सबसे सहज पहलू परिवार की करीब पांच साल की बच्ची से जुड़ा है। टी.के. वेद ने बताया कि घर के धार्मिक वातावरण का प्रभाव उस पर भी है। वह भी भोजन में अपनी क्षमता के अनुसार किसी न किसी चीज का त्याग करती है।
बच्ची के लिए कठिन नियम तय करने के बजाय उसे यह समझ दी गई है कि अपनी पसंद की कोई चीज छोड़ना भी त्याग की शुरुआत हो सकती है। इस तरह बहुत छोटी उम्र से ही उसे दशलक्षण का अर्थ केवल पूजा के रूप में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और इच्छाओं पर थोड़ा नियंत्रण रखने के रूप में समझाया जा रहा है।
तीन पीढ़ियां, स्थान अलग लेकिन दशलक्षण की भावना एक
रेखा जैन और टी.के. वेद की बातचीत में एक बात विशेष रूप से सामने आती है कि परिवार के सदस्य भले ही अलग-अलग देशों में रह रहे हों, लेकिन दशलक्षण के संस्कार उन्हें एक सूत्र में जोड़े हुए हैं। इंदौर में टी.के. वेद एकासन, सीमित भोजन, पूजा, अध्ययन और सामायिक के साथ दस दिन बिता रहे हैं तो अमेरिका में बच्चे एकासन, पूजन-विधान और भोजन की मर्यादा निभा रहे हैं। अगली पीढ़ी की पांच साल की बच्ची भी अपनी क्षमता के अनुसार त्याग करना सीख रही है।
टी.के. वेद परिवार के लिए दशलक्षण के ये दस दिन सामान्य जीवन की भागदौड़ से स्वयं को अलग कर धर्म को अधिक समय देने का अवसर हैं। यहां नियम उम्र और परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकते हैं, लेकिन भाव एक ही है—दस दिनों में जितना संभव हो, अपनी इच्छाओं को सीमित करना, धर्म को समझना और मिले संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना।





