श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दस दिन–दस परिवार’ में आज मिलिए इंदौर के डॉ. अनुपम जैन परिवार से।
दशलक्षण महापर्व के दस दिनों में सामान्य दिनचर्या से अलग क्या बदलाव आता है? परिवार के सदस्य धर्म-साधना, खान-पान और मंदिर की गतिविधियों से किस तरह जुड़ते हैं? इन्हीं विषयों पर श्रीफल समूह की संपादक रेखा संजय जैन ने डॉ. अनुपम जैन से विशेष बातचीत की।
डॉ. अनुपम जैन ने बताया कि उनके परिवार में पांच सदस्य हैं—वे स्वयं, उनकी पत्नी, बेटा, पुत्रवधू और माताजी। दशलक्षण पर्व के दौरान पूरा परिवार सुबह और शाम मंदिर दर्शन के लिए जाता है। बेटे ने प्रतिदिन भगवान का अभिषेक करने का नियम लिया है। पर्व के पहले दिन परिवार के पुरुष सदस्यों ने अभिषेक किया और अन्य सदस्यों ने भी मंदिर पहुंचकर धार्मिक क्रियाओं में सहभागिता की।
पहले दिन परिवार की ओर से हुई आरती
सुदामा नगर में दशलक्षण पर्व के दौरान प्रत्येक दिन एक परिवार आरती और धार्मिक व्यवस्था की जिम्मेदारी लेता है। रेखा संजय जैन से बातचीत में डॉ. अनुपम जैन ने बताया कि पर्व के पहले दिन की आरती और उससे जुड़ी व्यवस्था उनके परिवार की ओर से की गई।
परिवार के सदस्यों ने सुबह अभिषेक-पूजन किया और रात्रि में आरती में सहभागिता की। डॉ. जैन का कहना है कि सामूहिक रूप से धार्मिक आयोजन में जुड़ने से परिवार के प्रत्येक सदस्य के मन में उत्साह बना रहता है और बच्चों को भी घर के बड़ों के आचरण से संस्कार मिलते हैं।
बेटे ने लिया प्रतिदिन अभिषेक का नियम
डॉ. अनुपम जैन के बेटे ने दशलक्षण के सभी दिनों में नियमित अभिषेक करने का संकल्प लिया है। सुबह मंदिर जाकर अभिषेक करने के बाद ही वह अपनी दैनिक जिम्मेदारियों की शुरुआत करता है।
परिवार के अन्य सदस्य भी सुबह मंदिर दर्शन और पाठ करते हैं। शाम को पुनः मंदिर जाकर दर्शन, आरती और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। इस प्रकार पर्व के दिनों में परिवार की सुबह और शाम दोनों ही धर्म आराधना से जुड़ी रहती हैं।
डॉ. जैन स्वयं भी सुबह मंदिर दर्शन, पूजन और पाठ करने के बाद अपनी कार्यस्थली पर जाते हैं। व्यावसायिक और शैक्षणिक जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने प्रयास किया है कि पर्व के दौरान मंदिर दर्शन और धार्मिक नियमों का क्रम बाधित न हो।
महिलाओं का एकासन, शाम को केवल पानी
परिवार की महिलाओं ने दशलक्षण पर्व के दस दिनों तक एकासन का नियम लिया है। वे दिन में एक बार भोजन करती हैं और शाम को आवश्यकता के अनुसार पानी ग्रहण करती हैं।
स्वास्थ्य और आयु को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार नियमों का पालन करता है। परिवार का मानना है कि सभी के नियम समान होना आवश्यक नहीं है, लेकिन धर्म आराधना से प्रत्येक सदस्य का जुड़ना जरूरी है।
बाजार के भोजन और पानी का त्याग
खान-पान के नियमों पर रेखा संजय जैन से चर्चा करते हुए डॉ. अनुपम जैन ने बताया कि उन्होंने पर्व के दौरान बाजार के भोजन का पूरी तरह त्याग कर दिया है। बाहर का भोजन, पैकेटबंद खाद्य सामग्री और बाजार का पानी भी ग्रहण नहीं करते।
दैनिक कार्यों के कारण घर से बाहर जाना पड़े, तब भी वे अपने घर का पानी ही साथ रखते हैं। भोजन भी घर में बना हुआ शुद्ध और सात्विक ही ग्रहण किया जाता है। उन्होंने दो समय घर का भोजन करने का नियम रखा है, लेकिन बाहर की किसी भी खाद्य या पेय सामग्री से पूरी तरह दूरी बनाई है।
उनका मानना है कि पर्व में उपवास और कठिन तप सभी की शारीरिक स्थिति के अनुसार संभव नहीं होता, लेकिन भोजन की शुद्धता, बाहर के खाने का त्याग और मर्यादा का पालन प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कर सकता है।
व्यस्तता के बीच धर्म के लिए निश्चित समय
डॉ. अनुपम जैन ने बताया कि उन्हें अपने कार्यों के कारण प्रतिदिन बाहर जाना पड़ता है। इसके बावजूद सुबह मंदिर दर्शन, पाठ और धार्मिक क्रियाओं के लिए समय निश्चित किया गया है। कार्य से लौटने के बाद शाम को भी परिवार मंदिर जाता है।
पर्व के दिनों में परिवार ने मनोरंजन और अनावश्यक गतिविधियों के बजाय मंदिर, आरती, पाठ और परिवार के साथ धार्मिक चर्चा को प्राथमिकता दी है। इससे घर का वातावरण भी सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक शांत और धर्ममय हो जाता है।
नियम अलग, लेकिन परिवार की भावना एक
रेखा संजय जैन और डॉ. अनुपम जैन की बातचीत से यह बात सामने आई कि उनके परिवार में प्रत्येक सदस्य ने अपनी आयु, स्वास्थ्य और दिनचर्या के अनुसार अलग-अलग नियम लिए हैं। बेटा प्रतिदिन अभिषेक कर रहा है, महिलाएं एकासन कर रही हैं, डॉ. जैन ने बाजार के भोजन और पानी का त्याग किया है तथा पूरा परिवार सुबह-शाम मंदिर दर्शन और आरती से जुड़ा है।
इन दस दिनों में परिवार का प्रयास केवल धार्मिक क्रियाएं पूरी करना नहीं, बल्कि भोजन की शुद्धता, समय की मर्यादा और सामूहिक धर्म आराधना को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना है।
डॉ. अनुपम जैन परिवार की दिनचर्या यह संदेश देती है कि व्यस्त जीवन में भी परिवार के सभी सदस्य छोटे-छोटे नियम लेकर दशलक्षण पर्व से जुड़ सकते हैं। किसी का अभिषेक, किसी का एकासन, किसी का बाहर के भोजन का त्याग और सभी का सामूहिक मंदिर दर्शन—इन प्रयासों से ही घर में धर्म और संस्कारों का वातावरण बनता है।
श्रृंखला का उद्देश्य
श्रीफल की इस विशेष “दस दिन–दस परिवार” श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, आम दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा इस पर्व का परिवार और जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
कल मिलेंगे एक और परिवार से, जो बताएगा कि दशलक्षण पर्व उनके घर में किस तरह आत्मशुद्धि, संस्कार और अनुशासन का वातावरण बनाता
है।





