संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने कहा कि अच्छे कर्मों के फलस्वरूप हमें मनुष्य पर्याय मिली है तो हमें इसका सदुपयोग करना चाहिए। "अच्छे कर्म कर नर तन पावा" इसका सदुपयोग सिद्धत्व प्राप्ति में करना चाहिए। सिद्ध परमेष्ठी के साथ कुछ लोग अपने स्वभाव की तुलना करते हैं। उसको देखकर ऐसा लगता है कि यह एक प्रकार से उनके समान स्वयं को मानते हैं। शक्ति की अपेक्षा से मान लें तो कोई पाबंदी नहीं, किन्तु गुणों की अपेक्षा से मानते हैं तो यह सिद्ध परमेष्ठी का वर्णवाद माना जायेगा। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट...
डोंगरगढ़। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप हमें मनुष्य पर्याय मिली है तो हमें इसका सदुपयोग करना चाहिए। "अच्छे कर्म कर नर तन पावा" इसका सदुपयोग सिद्धत्व प्राप्ति में करना चाहिए। ज्ञातव्य है कि संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में चातुर्मासरत हैं।दही से समझाई ज्ञान की बात

आज धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि आप लोगो ने ये दृश्य देखा होगा कि जब दही को मथनी से मंथन करते हैं। यदि इसका अभ्यास जिसको होता है तो वह बीच–बीच में उसको देखते रहते हैं कि कुछ-कुछ रवादार कण ऊपर देखने को मिलते हैं। जब बहुत सारे कण (मक्खन) ऊपर दिखने लग जाते हैं तो वह समझ जाते हैं कि अब इसको ज्यादा मथना ठीक नहीं है। अनुपात से ही सब कुछ होना चाहिये। इसको कच्चा रखना भी ठीक नहीं और ज्यादा पकाना (मथना) भी ठीक नहीं है।

जब उसको बाहर निकालना चाहता है तो एक प्रकार से हाथ में चिपकने लगा, फिर उसने गर्म पानी से हाथ धोया फिर इसके उपरांत वह नवनीत को बाहर निकाला तो नवनीत हाथ में आ गया और दो-तीन बार हाथ में लेकर हिलाने पर वह गोल-गोल हो गया। अब जो भीतर था, वह बाहर आ गया और बचा हुआ मठा रहता है। मठा के ऊपर नवनीत तैरने लगा। उसका एक चौथाई हिस्सा ऊपर दूज या चतुर्थी के चंद्रमा के समान दिखने लगा और शेष हिस्सा मठा में डूबा रहता है। ऊपर वाले को अच्छा और नीचे वाले को बुरा माना जाये तो ठीक नहीं होगा। दोनों समान ही हैं, किन्तु तैरने की अपेक्षा से ऊपर वाला हल्का है और नीचे जो डूबा हुआ है, उसमें कुछ सम्मिश्रण अभी शेष है। जिसके कारण वह डूबा हुआ है। यह अभी न तो दही है और न ही घी है। यह बीच का है यह तो हुआ अरिहंत परमेष्ठी का स्वरूप।

अरिहंत कौन हैं, जो तैर तो रहे हैं लेकिन लोक के शिखर तक जाकर के बैठ नहीं रहे अभी, किन्तु बीच में ही तैरते हैं, बैठते हैं, ठीक हैं, चलते हैं तो जमीन से चार अंगुल ऊपर रहते हैं। उनके पीछे-पीछे हम सब भी चल सकते हैं। यह दशा है उनकी इसलिए वो भी संसारी कहलाते हैं। दूध से दही और दही से नवनीत बन गया है। लेकिन अभी उसका पूर्ण स्वभाव उद्घाटित नहीं हुआ है। घी की गंध और नवनीत की गंध में अभी अंतर है। वर्ण को देखते हैं तो भी अंतर है। घी को देखते हैं तो ऊपर से भी देख लो, तो वह ऊपर भी दिखता है और अन्दर का भी दिखता है। जबकि नवनीत में देखते हैं तो केवल ऊपर का ही दिखता है और अन्दर का नहीं दिखता है।

उसमें अभी दो-तीन बातें हैं ही नहीं। घी के अन्तरंग को देखते हुए यदि आप थोडा सा नीचे झुकेंगे तो आप भी उसमें दिख जायेंगे, किन्तु नवनीत में नहीं दिख सकते हो। इतनी सब बातों का मंथन करने से पता चलता है कि जैसे नवनीत और घी में अंतर है उसी प्रकार अरिहंत परमेष्ठी और सिद्ध परमेष्ठी में अंतर है। अन्तरंग से भी और बहिरंग से भी | कहां वह नवनीत कि दशा और कहां वह घी की दशा आपके भीतर छिपी हुई है, यह आपको देखना है। अरहंत परमेष्ठी जहां चार अंगुल ऊपर उठे हैं तो सिद्ध परमेष्ठी पूरे-पूरे लोक के अग्र भाग में विराजमान हैं। जैसे दूध में यदि आप घी को डाल दो तो वह पूरा का पूरा ऊपर दिखने लगता है उसका एक कण भी नीचे नहीं रहता है, यह सिद्ध अवस्था है। आप जितने नीचे बैठे हैं क्योंकि इनमें कमी का भंडार है। आपको पूछता हूं, घी तो वहां तक पहुंच गया।

पूरी शक्ति विद्यमान है आपके पास

आप बैठे–बैठे हाथ पर हाथ रखकर अपने आप को थोड़ा सा ऊपर उठाओ। आप अपने आप को एक इन्च भी ऊपर नहीं उठा पाते हो, कितने भारी हो आप, इतने मोटे-ताजे हो कि चार व्यक्ति के द्वारा भी उठने वाले नहीं हो। सिद्ध परमेष्ठी के साथ कुछ लोग अपने स्वभाव की तुलना करते हैं। उसको देखकर ऐसा लगता है कि यह एक प्रकार से उनके समान स्वयं को मानते हैं। शक्ति की अपेक्षा से मान लें तो कोई पाबंदी नहीं, किन्तु गुणों की अपेक्षा से मानते हैं तो यह सिद्ध परमेष्ठी का वर्णवाद माना जायेगा। दूध तो दूध है, दही तो दही है, नवनीत तो नवनीत है, घी तो घी है किन्तु आप दूध को सुरक्षित रखते हो तो घी तक आपकी यात्रा हो सकती है। पूरी शक्ति विद्यमान है आपके पास। दूध की मर्यादा जब तक है तब तक आप उसका उपयोग कर लो। मर्यादा के बाद आप उसको जमा नहीं सकते, वह फट जाता है। इसलिए आप अभी सम्यग्दर्शन के लिये योग्य हैं और एक इन्द्रिय भी कम हो जाये तो सम्यग्दर्शन के लिये फटे हुए दूध की तरह अयोग्य हो जायेंगे। इसलिए योग्यता के साथ आपके पास यह अवसर मिला है इसका सदुपयोग कर मनुष्य जन्म को मुक्ति मार्ग में लगाकर अपना जीवन सार्थक करें। दौलतराम जी छहढाला में लिखते हैं कि अच्छे कर्म से नर तन पाया है, इसका उपयोग सिद्धत्व की प्राप्ति के लिये करना चाहिये क्योंकि अन्य पर्याय में यह कार्य संभव नहीं है।

प्राप्त किया सौभाग्य

आज आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी रूबी दीदी, प्रिया दीदी (प्रतिभास्थली, हथकरघा) परिवार को प्राप्त हुआ।

चंद्रगिरी मंदिर निर्माण का कार्य जारी

श्री दिगम्बर जैन चंद्रगिरी अतिशय तीर्थ क्षेत्र के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन ने बताया कि क्षेत्र में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी की विशेष कृपा एवं आशीर्वाद से अतिशय तीर्थ क्षेत्र चंद्रगिरी मंदिर निर्माण का कार्य तीव्र गति से चल रहा है और यहां प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ में कक्षा चौथी से बारहवीं तक सीबीएसई पाठ्यक्रम में विद्यालय संचालित है और इस वर्ष से कक्षा एक से पांचवी तक डे स्कूल भी संचालित हो चुका है। यहां गौशाला का भी संचालन किया जा रहा है।

जिसका शुद्ध और सात्विक दूध और घी भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहता है। यहां हथकरघा का संचालन भी वृहद रूप से किया जा रहा है जिससे जरुरतमंद लोगों को रोजगार मिल रहा है। यहां बनने वाले वस्त्रों की डिमांड दिन प्रतिदिन बढती जा रही है। यहां वस्त्रों को पूर्ण रूप से अहिंसक पद्धति से बनाया जाता है, जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से उपयोग कर्त्ता को बहुत लाभ होता है। आचार्य श्री के दर्शन के लिए दूर-दूर से उनके भक्त आ रहे हैं। क्षेत्र पर आने वाले सभी बंधुओं के आवास एवं भोजन आदि की समुचित व्यवस्था की गई है। कृपया आने के पूर्व इसकी जानकारी कार्यालय में अवश्य दें, जिससे सभी भक्तो के लिए सभी प्रकार की व्यवस्था कराई जा सके। यह जानकारी चंद्रगिरी डोंगरगढ़ के ट्रस्टी सिंघई निशांत जैन (निशु) ने दी है।

निःशुल्क आयुर्वेद स्वर्ण प्राशन संस्कार शिविर 18 से

श्री दिगम्बर जैन चंद्रगिरी अतिशय तीर्थ क्षेत्र के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन ने बताया कि क्षेत्र में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी की विशेष कृपा एवं आशीर्वाद से चातुर्मास कमेटी एवं ट्रस्ट के तत्वाधान में निःशुल्क आयुर्वेद स्वर्ण प्राशन संस्कार शिविर पुष्य नक्षत्र में 18 जुलाई 2023, मंगलवार को प्रातः 8 बजे से शाम 4 बजे तक 1 वर्ष से 14 वर्ष तक के बालक, बालिकाओं के लिए लगाया जाएगा। इसमें उन्हें आयुर्वेदिक स्वर्ण प्राशन पिलाया जाएगा। यह बुद्धि, याददाश्त, रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं शारीरिक शक्ति बढ़ने वाला आयुर्वेदिक वैक्सीनेशन व ब्रेन पॉवर टॉनिक है।