मुरैना। शहर के बड़े जैन मंदिर में ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि चातुर्मास केवल साधु-संतों के नगर में रुकने का अवसर नहीं, बल्कि श्रावकों के लिए भी धर्माराधना, आत्मचिंतन और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने का स्वर्णिम अवसर है।

उन्होंने कहा कि साधु-संत वर्षा ऋतु के चार माह एक स्थान पर रहकर साधना, स्वाध्याय, ध्यान और धर्मोपदेश में निरंतर प्रवृत्त रहते हैं। इसी प्रकार श्रावकों को भी इस पावन काल में अपने जीवन में धार्मिक नियम और संकल्प धारण करने चाहिए।

संतों के सान्निध्य का जीवन में उतरे प्रभाव

आचार्यश्री ने कहा कि चातुर्मास में श्रावकों का प्रमुख कर्तव्य है कि वे साधु-संतों की संयम चर्या में सहभागी बनें और उनकी साधना में सहयोग करें। प्रतिदिन मंदिर जाकर संतों के दर्शन, प्रवचन एवं उपदेशों का श्रवण करें तथा उनके बताए मार्ग को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल प्रवचन सुनना पर्याप्त नहीं है। प्रवचन से प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में उतारना ही चातुर्मास की वास्तविक सार्थकता है।

संतों की साधना में सहयोग श्रावकों का सौभाग्य

आचार्यश्री ने कहा कि चातुर्मास आयोजन समिति और प्रमुख श्रावकों का दायित्व महत्वपूर्ण है। उन्हें साधु-संतों से निरंतर संपर्क बनाए रखते हुए विनयपूर्वक उनकी आवश्यकताओं की जानकारी लेते रहना चाहिए।

विशेषकर दिगंबर साधु अपनी संयम मर्यादा में रहते हैं और अपनी आवश्यकताओं को लेकर श्रावकों के पास नहीं आते। इसलिए श्रावकों को जागरूक होकर उनकी आवश्यकताओं को समझना तथा आहारचर्या, स्वाध्याय, अध्ययन, ध्यान, स्वास्थ्य और प्रवचन सहित धार्मिक साधनाओं में किसी प्रकार का व्यवधान न हो, इसकी व्यवस्था करना चाहिए।

श्रावकों के जीवन में परिवर्तन ही चातुर्मास की सार्थकता

मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि केवल चार महीने साधु-संतों के नगर में विराजमान रहने से चातुर्मास सफल नहीं हो जाता। इसकी सार्थकता तब है, जब नगर के श्रावक अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएं।

उन्होंने परिवार के साथ धर्मसभा में आने, बच्चों एवं युवाओं को संतों के सान्निध्य से जोड़ने तथा नियमित स्वाध्याय और धर्मचर्चा करने का आह्वान किया। मुनिश्री ने कहा कि संतों की सेवा केवल उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग को जीवन में उतारना भी है।

धर्म को जीवन में उतारने का संकल्प लें

मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि इस चातुर्मास में केवल संतों के नगर में रहने का आनंद लेने के बजाय अपने जीवन को धर्ममय बनाने का संकल्प लेना चाहिए। साधु-संत चातुर्मास में नगर को अपना सान्निध्य देते हैं और श्रावक अपनी श्रद्धा, सेवा एवं साधना से चातुर्मास को सार्थक बनाते हैं।

मंगलाचरण से हुआ धर्मसभा का शुभारंभ

धर्मसभा का शुभारंभ श्रीमती गुंजन जैन के सुमधुर मंगलाचरण से हुआ। समाज के श्रेष्ठीजन एवं गणमान्यजनों द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया। धर्मसभा का संचालन विद्वत् नवनीत जैन शास्त्री ने किया। सभा में बड़ी संख्या में समाजजन एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।