5252 वर्ष पूर्व जो युग पुरुष जिसे समूचा जगत योगेश्वर कृष्ण के रूप में पूजता है। उनकी शिक्षाओं और संदेशों और भगवान महावीर के संदेशों में काफी समानताएं हैं। उन्होंने कर्म को प्रधान बताया। जीवदया को धर्म बताया। अपने अधिकारों के लिए पीछे नहीं हटने को आत्म सम्मान निरूपित किया। महाभारत में शस्त्र न उठाने की शपथ लेकर अहिंसा का भी संदेश दिया। ऐसे दिव्यता से परिपूर्ण महामानव के जन्मोत्सव पर अजीत कोठिया, की डडूका से यह कविता पढ़िए...
कविता: -

कान्हा आ जाओ एकबारः फिर से लो अवतार

-अजीत कोठिया, डडूका, बांसवाड़ा (राजस्थान)

ओ! कान्हा हर साल मनाते जन्माष्टमी।

फिर भी कष्टों का लग रहा अंबार

कान्हा आ जाओ एक बार,

फिर से लो नव अवतार।

आपके युग में तो एक ही कंस था

पर अब तो है कंसों की है भरमार।

हर गली, हर मोड पर बलात्कारी,

चारों ओर मचा है हाहाकार।

अब तो लेना है कान्हा नवावतार।

आपने तो वादा भी किया था,

जब-जब धरती पर बढ़ेगा अत्याचार,

तब तब में लूंगा अवतार!

फिर देरी क्यों कर रहे कान्हा?

आ जाओ फिर से एक बार।

आपकी गैया और उनका बछड़ा

कोई भी सुरक्षित नहीं।

माखन और दूध तक असली नहीं

मिलावट और इंजेक्शनी दूध का

हो रहा कारोबार।

कान्हा आ जाओ फिर से एक बार

यशोदा कर रही प्रलाप

राधाओं का विलाप

देवकी पर हो रहा अत्याचार

क्या तुम्हें उद्वेलित नहीं करता ?

यही प्रासंगिक मौका है कान्हा

ले लो अवतार इससे पहले की

हम हो जाएं तार-तार

अब तो ले लो कान्हा नवावतार।

-अजीत कोठिया, डडूका, बांसवाड़ा (राजस्थान)