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सारांश :

कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन केवल परिस्थितियों से नहीं बनता, बल्कि उन परिस्थितियों को देखने वाली उसकी धारणा जीवन की दिशा तय करती है। संसार जैसा दिखाई देता है, वह हमेशा वैसा नहीं होता। बहुत कुछ हमारी दृष्टि और मानसिक धारणा का परिणाम होता है। इसलिए जीवन बदलने से पहले अपनी धारणा बदलना जरूरी है।

विचारों से बनती है धारणा

मुनिश्री ने कहा कि विचार स्थायी नहीं होते, वे आते-जाते रहते हैं। लेकिन जब कोई विचार लगातार दोहराया जाता है तो धीरे-धीरे धारणा का रूप ले लेता है। फिर वही धारणा ऐसे चश्मे का काम करती है, जिससे व्यक्ति संसार, लोगों और परिस्थितियों को देखने लगता है।

यदि किसी व्यक्ति ने मान लिया कि दुनिया में सभी लोग स्वार्थी और धोखेबाज हैं तो उसका मन उन्हीं घटनाओं को अधिक देखेगा, जो उसकी धारणा को सही साबित करेंगी। इसके विपरीत आगे बढ़ने की धारणा रखने वाला व्यक्ति कठिनाइयों में भी अवसर तलाश लेता है।

दोहराव, अनुभव और वातावरण का प्रभाव

मुनिश्री ने बताया कि धारणा बनने के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं—दोहराव, भावनात्मक अनुभव और वातावरण। किसी बात को बार-बार सुनना, देखना या सोचना उसे मन में गहरा बैठा देता है। वहीं कोई गहरा भावनात्मक अनुभव भी एक क्षण में धारणा बना सकता है।

परिवार, समाज, संस्कार, मित्र, गुरु और आज सोशल मीडिया भी हमारी धारणाओं को लगातार प्रभावित कर रहे हैं।

रील लाइफ नहीं, वास्तविक जीवन पहचानें

मुनिश्री ने कहा कि डिजिटल युग में सबसे बड़ी चुनौती उधार की धारणाओं से बचने की है। लोग दूसरों के सजाए हुए जीवन को वास्तविक जीवन समझने लगे हैं। रील में दिखाई देने वाली सफलता, सुंदरता और सुख के पीछे का संघर्ष दिखाई नहीं देता।

जब रील लाइफ को रियल लाइफ मान लिया जाता है तो व्यक्ति अपने वास्तविक जीवन से असंतुष्ट होने लगता है। इसलिए सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चीज को सत्य मानने के बजाय अपनी दृष्टि से उसका परीक्षण करना चाहिए।

एक परिस्थिति, अलग परिणाम

उन्होंने कहा कि एक ही असफलता दो व्यक्तियों के लिए अलग अर्थ रख सकती है। एक व्यक्ति उसे जीवन का अंत मान सकता है, जबकि दूसरा उसे नई शुरुआत का अवसर समझ सकता है। परिस्थिति समान होती है, लेकिन धारणा अलग होने से परिणाम अलग हो जाते हैं।

मुनिश्री ने विज्ञान के संदर्भ में मस्तिष्क के रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम (आरएएस) का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति जिस बात को महत्वपूर्ण मानता है, उससे संबंधित सूचनाएं उसे अधिक आसानी से दिखाई देने लगती हैं। इसलिए अवसर खोजने वाली दृष्टि जीवन में नए रास्ते पहचान सकती है।

सम्यक दृष्टि जीवन की मूल आवश्यकता

जैन दर्शन के संदर्भ में मुनिश्री ने कहा कि सम्यक दृष्टि जीवन की मूल आवश्यकता है। मिथ्यात्व से प्रभावित दृष्टि वस्तु और जीवन को विपरीत रूप में देखने लगती है। जैसे-जैसे भीतर की योग्यता विकसित होती है और मिथ्यात्व का क्षय या उपशम होता है, दृष्टि सम्यक दिशा में बढ़ती है।

सम्यक धारणा व्यक्ति के भीतर भय, लोभ और अहंकार को कम करती है तथा दया, वात्सल्य, सहनशीलता और संतुलन को बढ़ाती है।

तुरंत परिणाम की मानसिकता से बचें

मुनिश्री ने आज की पीढ़ी की एक बड़ी समस्या तुरंत परिणाम पाने की मानसिकता को बताया। युवा पढ़ाई में तुरंत सफलता, नौकरी में जल्दी पदोन्नति, व्यापार में तत्काल लाभ और जीवन में शीघ्र सुख चाहते हैं। परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आने पर निराशा घेर लेती है।

उन्होंने बीज का उदाहरण देते हुए कहा कि बीज बोने के अगले दिन उसे निकालकर यह नहीं देखा जा सकता कि जड़ कितनी बढ़ी। उसे मिट्टी, पानी, धूप और समय देना पड़ता है। इसी प्रकार लक्ष्य के लिए ईमानदार श्रम, निरंतरता और धैर्य आवश्यक है।

रिश्तों में भी जरूरी है धैर्

मुनिश्री ने कहा कि अधीरता का प्रभाव रिश्तों पर भी पड़ रहा है। विवाह और परिवार जैसे संबंधों में थोड़ी-सी असहमति आते ही लोग अंतिम निर्णय लेने लगते हैं। अच्छे समय में साथ रहना आसान है, लेकिन कठिन समय में साथ खड़े रहना रिश्ते की असली कसौटी है।

संवाद, धैर्य, अनुभव और बड़ों के मार्गदर्शन को महत्व देने से अनेक रिश्तों को टूटने से बचाया जा सकता है।

धारणा बदलेगी तो प्राथमिकताएं बदलेंगी

स्वास्थ्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति यह धारणा बना ले कि स्वस्थ और ऊर्जावान रहना जरूरी है तो उसकी पसंद बदल जाती है। फिर उसे समोसा-कचौड़ी के बजाय फल और सलाद अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगते हैं। वस्तुएं वही रहती हैं, लेकिन धारणा बदलते ही प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।

मुनि संघ से लिया आशीर्वाद

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि मुनिश्री के प्रवचन का मूल संदेश यही रहा कि व्यक्ति सोशल मीडिया और समाज से मिली उधार की धारणाओं का अंधानुकरण न करे। अपनी दृष्टि को परखे और सकारात्मक तथा सम्यक धारणा विकसित करे।

उक्त अवसर पर मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज सहित संघ के समस्त ऐलक-क्षुल्लक महाराज उपस्थित रहे। बड़ी संख्या में भारतवर्ष से जैन समाज के श्रद्धालु एवं क्षेत्र कमेटी के पदाधिकारी उपस्थित रहे। रायपुर जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठी विनोद बडजात्या अपने जन्मदिवस पर सपरिवार पधारे और मुनि संघ से आशीर्वाद लिया। उन्होंने बड़े बाबा के चरणों में अभिषेक एवं शांतिधारा भी की।

संदेश और सामाजिक महत्व

मुनिश्री ने कहा कि जीवन को बदलने के लिए हर बार बाहरी परिस्थितियों को बदलना जरूरी नहीं है। कई बार केवल अपनी दृष्टि, धारणा और प्रतिक्रिया बदलने से जीवन का अनुभव बदल जाता है।

धारणा बदलेगी तो दृष्टि बदलेगी, दृष्टि बदलेगी तो व्यवहार बदलेगा और व्यवहार बदलने से जीवन की दिशा बदल जाएगी।