धरियावद। महावीर वाटिका स्थित पुण्यसागर सभागार में परम पूज्य आचार्य कल्पपुण्यसागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के नौवें दिन श्रद्धा और भक्ति का विशेष वातावरण रहा। आठ जोड़ों ने सपरिवार तथा अन्य श्रावक-श्राविकाओं के साथ विधान में सहभागिता करते हुए भक्तामर के 48 अर्घ्य समर्पित किए। संगीतमय आराधना से पूरा सभागार भक्तिरस से सराबोर रहा।

आठ जोड़ों ने समर्पित किए 48 अर्घ्य

विधान के दौरान आठ जोड़ों ने सपरिवार बैठकर भक्तामर स्तोत्र के 48 अर्घ्य विधि-विधानपूर्वक समर्पित किए। अन्य श्रावक-श्राविकाओं ने भी भक्ति एवं आराधना में सहभागिता की। धार्मिक अनुष्ठान के दौरान वातावरण भक्तिमय बना रहा।

भक्त और भगवान एक-दूसरे के पूरक

पूजन एवं विधान के पश्चात प्रवचन श्रृंखला में आचार्य कल्पपुण्यसागर जी महाराज ने भक्त और भगवान के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक भगवान का भक्त होता है और भक्त की भक्ति भगवान के प्रति समर्पण का माध्यम है। इसी प्रकार साधु और श्रावक भी एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के सहयोग और समन्वय से धर्म की प्रभावना आगे बढ़ती है।

भगवान ने पाया, वह तप और साधना से पाया

आचार्यश्री ने कहा कि संसार में दो प्रकार की भावना देखने को मिलती है। कुछ लोग चाहते हैं कि भगवान ने जो प्राप्त किया, वह उन्हें भी मिल जाए, जबकि कुछ लोग भगवान द्वारा छोड़ी गई सांसारिक वस्तुओं को प्राप्त करना चाहते हैं। लेकिन यह समझना जरूरी है कि भगवान ने जो पाया, वह तप, संयम और साधना के माध्यम से पाया है।

बिना तपे भगवान बनना संभव नहीं

आचार्यश्री ने कहा कि आज मनुष्य तप, संयम और व्रत से दूर भागता है तथा सुख-सुविधाओं को अधिक महत्व देता है। भगवान बनने के लिए तपना आवश्यक है। संसार का वैभव मनुष्य अनेक बार प्राप्त कर चुका है, लेकिन भगवान ने जो प्राप्त किया, वह अभी तक प्राप्त नहीं कर पाया। यही कारण है कि जीव संसार के विभिन्न दुखों में उलझा हुआ है।

भगवान से मांगने के बजाय उनके मार्ग पर चलें

आचार्यश्री ने कहा कि भगवान के समक्ष भी मनुष्य अक्सर सांसारिक वस्तुओं की मांग करता है, जबकि जिन वस्तुओं की वह मांग कर रहा है, भगवान स्वयं उनका त्याग कर चुके हैं। इसलिए भगवान से सांसारिक वस्तुएं मांगने के बजाय उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए।

भक्ति से पुण्य का निर्माण होता है

आचार्यश्री ने कहा कि वीतराग भगवान किसी को कुछ देते नहीं हैं, लेकिन उनकी भक्ति करने से भक्त के भीतर पुण्य का निर्माण होता है। उसी पुण्य के निमित्त से अनेक आकांक्षाएं पूर्ण होती हैं। इसलिए भगवान की भक्ति केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि जीवन को तप, संयम, त्याग और साधना के मार्ग पर ले जाने के लिए करनी चाहिए।

भक्तामर विधान से धर्म-साधना का संदेश

प्रवचन के दौरान आचार्यश्री के प्रेरणादायी विचारों से श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के माध्यम से धरियावद में धर्म, भक्ति, तप और साधना का क्रम निरंतर जारी है। श्रद्धालु नियमित रूप से विधान एवं धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।