अयोध्या। गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने धर्मसभा में अयोध्या जैन तीर्थ के जीर्णोद्धारक आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज के जीवन, साधना और धर्मप्रभावना के कार्यों का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि अयोध्या के जैन तीर्थों के संरक्षण और विकास में आचार्यरत्न देशभूषण जी महाराज का योगदान अतुलनीय एवं दूरदर्शी रहा है।

अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद, कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने यह जानकारी दी।

जन्म, दीक्षा और आचार्य पद

ज्ञानमती माताजी ने बताया कि आचार्यरत्न देशभूषण जी महाराज का जन्म सन् 1905 में कर्नाटक के कोथली (बेलगांव) में प्रतिष्ठित श्रावक सत्यगोंडा पाटिल एवं माता अक्कादेवी के यहां हुआ। बाल्यकाल में उनका नाम बालगोंडा रखा गया।

उन्होंने पूज्य मुनिश्री जयकीर्ति जी महाराज से दीक्षा प्राप्त की। ऐलक दीक्षा के बाद फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, 8 मार्च 1936 को कुंथलगिरि में उन्हें मुनि दीक्षा प्राप्त हुई और उनका नाम देशभूषण महाराज हुआ। सन् 1948 में गुरु आज्ञा से सूरत की जैन समाज द्वारा उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया। बाद में दिल्ली दिगंबर जैन समाज ने उनके कुशल नेतृत्व से प्रभावित होकर उन्हें ‘आचार्यरत्न’ की उपाधि से अलंकृत किया।

51 वर्षों की साधना और धर्मप्रभावना

माताजी ने कहा कि आचार्यरत्न देशभूषण जी महाराज का दीक्षा जीवन 51 वर्षों का रहा। उन्होंने देश के अधिकांश भागों में पदयात्रा कर धर्मप्रभावना की और लगभग 100 कल्याणकारी दीक्षाएं प्रदान कीं।

उनकी प्रमुख शिष्या कुमारी मैना ने सन् 1953 में महावीरजी तीर्थ, राजस्थान में उनसे क्षुल्लिका दीक्षा लेकर ‘वीरमती’ नाम प्राप्त किया। आगे चलकर सन् 1956 में पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा प्राप्त कर वे ‘ज्ञानमती’ नाम से विख्यात हुईं।

अयोध्या तीर्थ के विकास में ऐतिहासिक भूमिका

आचार्यरत्न देशभूषण जी महाराज ने सन् 1952 में अयोध्या के कटरा स्थित दिगंबर जैन मंदिर में भगवान आदिनाथ, भरत एवं बाहुबली प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा संपन्न कराई।

उनकी प्रेरणा से सन् 1965 में अयोध्या के रायगंज स्थित सात एकड़ के विशाल प्रांगण में जिनमंदिर का निर्माण कराया गया और वहां 31 फुट ऊंची भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा विराजमान की गई। माताजी ने कहा कि यह पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव अयोध्या और समस्त अवध क्षेत्र का ऐतिहासिक कार्य था।

उन्होंने कहा कि यह प्रतिमा आज भी अयोध्या को अनंत तीर्थंकरों की जन्मभूमि होने के गौरव से जोड़ती है तथा जैनत्व के संरक्षण और संवर्धन की प्रेरणा देती है।

युवा शक्ति को संगठित करने की प्रेरणा

ज्ञानमती माताजी ने बताया कि सन् 1974 में दिल्ली में तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज, आचार्यरत्न देशभूषण जी महाराज, आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी एवं अन्य साधु-संतों के सान्निध्य में भगवान महावीर का 2500वां निर्वाण महोत्सव चारों जैन संप्रदायों द्वारा संयुक्त रूप से संपन्न हुआ था।

उन्होंने कहा कि आचार्यरत्न देशभूषण जी महाराज की प्रेरणा से 1 जनवरी 1977 को फलटण, महाराष्ट्र में अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद की स्थापना हुई। यह संस्था आज भी युवाओं को जोड़कर समाज विकास में युवा शक्ति का सदुपयोग कर रही है।