आर्यिका श्री महायश मति जी ने किए केश लोच : केशलोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाओं 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक -क्षुल्लिका 36 साधुओं सहित जयपुर चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। अनेक श्रद्धालुओं के सामने श्री वर्धमान सागर जी की सुशिष्या आर्यिका श्री महायश मति ने गुरुवार को केशलोचन किया। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट...
जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाओं 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक -क्षुल्लिका 36 साधुओं सहित जयपुर चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। अनेक श्रद्धालुओं के सामने श्री वर्धमान सागर जी की सुशिष्या आर्यिका श्री महायश मति ने गुरुवार को केशलोचन किया। केशलोचन के बारे में संघ की आर्यिका श्री पूर्णिमा मति जी ने चर्चा में बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 से 4 माह की अवधि के भीतर के केशलोचन करना अनिवार्य है। केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण है। केशलोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है। जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है, बालों का लोचन अगर नहीं किए जाएं तो उसमें छोटे-छोटे जीवों की उत्पत्ति होने की संभावना होती है। जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं। सुरेश सबलावत भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार माताजी ने बताया कि जैन साधु अपरिग्रही होते हैं। इसलिए जैन साधु अपने हाथ से केशलोचन करते हैं। केश लोच से शरीर से ममत्व दूर होता है। केश लोचन के समय तप, संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है। जिस दिन जैन साधु केशलोच करते हैं, उस दिन उपवास करते हैं।
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