इंदौर। नेमिनगर जैन कॉलोनी में नेमिनगर चातुर्मास उत्सव समिति के तत्वावधान में चल रहे प्राकृताचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ससंघ के वर्षायोग चातुर्मास के तहत नित्य प्रवचन में धर्म, ज्ञान और आत्म परिचय के संदेशों से श्रावक अपने जीवन को धन्य कर रहे हैं। बुधवार को भी यहां पर प्राकृताचार्य चतुर्थ पट्टाधीश श्री सुनीलसागर जी ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि फैशन हर दिन बदलता है, समय के साथ चेहरे की सुंदरता भी बदल जाती है और शरीर भी एक दिन परिवर्तन के नियम के अधीन हो जाता है। जन्म-मरण के इस संसार में न जाने कितनी बार हमारे चेहरे बदले, शरीर बदले, तन बदला और मन की अवस्थाएं भी बदलती रहीं लेकिन, इन सभी परिवर्तनों के बीच यदि कुछ संवारने योग्य है, तो वह है अपनी आत्मा और अपने भाव।
अपने भीतर के रूप को सुंदर बनाएं
आचार्यश्री ने कहा कि मानव जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह केवल संसार में सुख पाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने और निखारने का अवसर है। इसी जीवन में एक साधारण संसारी जीव अपने पुरुषार्थ से सिद्धत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसलिए बाहरी रूप-सज्जा से अधिक आवश्यक है कि हम अपने भीतर के रूप को सुंदर बनाएं।
जो अपने भीतर को संवार लेता है, वही वास्तव में सुंदर बनता है
आचार्यश्री सुनीलसागर जी महाराज ने अपने संदेश में कहा कि आज मनुष्य बाहरी दुनिया में अनेक मुखौटे पहनकर जी रहा है। चेहरे पर मुस्कान है, शब्दों में मिठास है, लेकिन मन के भीतर सच्चाई कितनी हैकृयह सबसे बड़ा प्रश्न है। मन के खोटे भाव, स्वार्थ, छल और कपट बाहरी सुंदरता को भी फीका कर देते हैं। इसलिए वास्तविक निखार महंगे कपड़ों, बदलते फैशन या सुंदर चेहरे में नहीं, बल्कि निर्मल भावों, सच्चे मन और आत्मिक जागृति में है। जो अपने भीतर को संवार लेता है, वही वास्तव में सुंदर बनता है और वही अपने मानव जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है।



