आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में संतचर्या शिरोमणि पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महामुनिराज के शिष्य मुनि श्री 108 समत्वसागर जी महाराज, मुनि श्री 108 शीलसागर जी महाराज एवं मुनि श्री 108 सुप्रभातसागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में धर्मसभा आयोजित हुई।

कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के चित्र अनावरण एवं मुनि संघ के पाद प्रक्षालन के साथ हुआ।

ज्ञान के साथ विवेक जरूरी

मुनि श्री समत्वसागर जी महाराज ने कहा कि ज्ञान की आराधना बुद्धि के क्षयोपशम पर आधारित हो सकती है, लेकिन ज्ञान को ग्रहण कर जीवन में उतारना विवेक पर निर्भर है। विवेकवान व्यक्ति ही जीवन में सही निर्णय लेकर आनंद और आत्मिक उन्नति की दिशा में बढ़ सकता है।

उन्होंने कहा कि ज्ञानी होना तभी सार्थक है, जब व्यक्ति अपने आचरण में संयम, विनम्रता और विवेक अपनाए। ज्ञान होने के बाद भी यदि व्यवहार में कषाय बनी रहें, तो वह ज्ञान जीवन को अपेक्षित दिशा नहीं दे पाता।

कषायों से बचने की प्रेरणा

मुनि श्री ने क्रोध, मान, माया और लोभ को जीवन की प्रगति में बाधक बताते हुए कहा कि प्रत्येक जीव कषायों से प्रभावित हो सकता है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य इन कषायों को पहचानकर उनका परित्याग करने का प्रयास करना है।

उन्होंने कहा कि अहंकार व्यक्ति के कार्यों को बिगाड़ देता है। समाज में मतभेद और टकराव का एक बड़ा कारण स्वयं को बड़ा और दूसरों को छोटा मानने की प्रवृत्ति है।

‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ें

मुनि श्री ने एक प्रसंग के माध्यम से समझाया कि ‘मैं’ का भाव अहंकार को बढ़ाता है। व्यक्ति को केवल स्वयं के हित और मान की अपेक्षा सामूहिकता, विनय और सभी जीवों के प्रति कल्याणकारी भावना को अपनाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब तक ‘मैं’ का भाव ‘हम’ में परिवर्तित नहीं होगा, तब तक जीवन में समता और आत्मकल्याण का विकास कठिन रहेगा।

समाजजनों की रही सहभागिता

कार्यक्रम का संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया। इस अवसर पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, रमेश जैन, प्रवीण जैन, शैलेश जैन, मुकेश जैन, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, सचिन जैन, आशु जैन, विजय जैन शास्त्री, अनिकेत जैन, रोहित जैन, नितिन जैन, देवेंद्र जैन, मुरारी लाल जैन, दीपक जैन, गौरव जैन, मुन्नालाल जैन, संभव जैन सहित अनेक समाजजन उपस्थित रहे।

श्रीफल साथी : राहुल जैन, आगरा