आगरा। निर्मल सेवा सदन, रकाबगंज-छीपीटोला में दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत उत्तम सत्य धर्म की आराधना के साथ आत्मस्पंदन ध्यान शिविर श्रद्धा और भक्तिभाव से आयोजित हुआ। आचार्य विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि समत्वसागर, मुनि शीलसागर एवं मुनि सुप्रभातसागर के सान्निध्य तथा पं. प्रदीप शास्त्री, दमोह के निर्देशन में शिविरार्थियों ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और विधान में सहभागिता की।

इसी अवसर पर आचार्य डॉ. लोकेश मुनि का निर्मल सेवा सदन में आगमन हुआ और मुनि समत्वसागर के साथ उनका मंगल मिलन हुआ। आगरा में 20 सितंबर को दोनों संतों के दर्शन एवं चर्चा का कार्यक्रम निर्मल सदन, छीपीटोला में निर्धारित होने की स्वतंत्र पुष्टि स्थानीय कार्यक्रम सूची से भी होती है।

‘हम सब भगवान महावीर की परंपरा से जुड़े हैं’

आचार्य लोकेश मुनि ने मुनि समत्वसागर को वंदन करते हुए उनकी सरलता और विनयशीलता की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि दिगंबर और श्वेतांबर जैसे पंथों की परंपराएं एवं पूजा-पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं, लेकिन भगवान महावीर के अहिंसा और अनेकांत के सिद्धांत सभी को जोड़ने वाले हैं।

उन्होंने कहा कि धार्मिक पहचान का मूल आधार बाहरी भेद से अधिक व्यक्ति की भावधारा की पवित्रता, सरलता और कषायों से मुक्ति होना चाहिए। क्रोध, मान, माया, लोभ, राग और द्वेष से मुक्त होने की साधना ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाती है।

‘कषाय मुक्त होंगे तो सत्य स्पष्ट होने लगेगा’

मुनि समत्वसागर जी ने उत्तम सत्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि सत्य बनाया नहीं जाता, वह वस्तु का स्वभाव है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब मनुष्य सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझने लगता है।

उन्होंने दशलक्षण के क्रम को समझाते हुए कहा कि क्रोध, अहंकार, मायाचारी और लोभ जैसी कषायें व्यक्ति की सत्य को देखने और समझने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। इसलिए क्षमा, मार्दव, आर्जव और शौच की साधना के बाद सत्य को समझने की दृष्टि अधिक निर्मल होती है।

‘धर्म के सिद्धांत व्यवहार में भी दिखाई दें’

मुनि समत्वसागर ने आचार्य लोकेश मुनि की विनयशीलता का उल्लेख करते हुए कहा कि जिनशासन कटुता नहीं, बल्कि सरलता और परस्पर प्रेम की शिक्षा देता है। यदि धार्मिक सिद्धांत आपसी व्यवहार में नहीं उतरते तो केवल प्रवचनों में उनकी चर्चा पर्याप्त नहीं है।

उन्होंने कहा कि दशलक्षण के दस धर्म व्यक्ति के भीतर शांति स्थापित करने का मार्ग बताते हैं और यही भावना व्यापक स्तर पर विश्व शांति का आधार बन सकती है।

नवीन जैन ने दिया जैन समाज की एकता का संदेश

राज्यसभा सदस्य नवीन जैन ने कार्यक्रम में कहा कि दिगंबर, श्वेतांबर, तेरापंथी या स्थानकवासी जैसी परंपराओं से पहले सभी की साझा पहचान जैन धर्म से जुड़ी है। उन्होंने भगवान महावीर के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर समाज की एकता पर जोर दिया।

आचार्य लोकेश मुनि का किया अभिनंदन

कार्यक्रम में आचार्य डॉ. लोकेश मुनि के आगमन पर सकल जैन समाज की ओर से नागरिक अभिनंदन किया गया। नवीन जैन एवं योगेश जैन ने उन्हें स्मृति-चिह्न और शॉल भेंट कर सम्मानित किया।

मंच संचालन सतेंद्र जैन साहुला ने किया। श्रुत मंथन वर्षायोग समिति से योगेश जैन, रमेश जैन, मनोज जैन, मुकेश जैन, प्रवीण जैन पद्मावती, शैलेश जैन, डॉ. सुमन जैन सुराना, संजय जैन सुराना, विवेक जैन, चक्रेश जैन, आशीष जैन बाबा, प्रवीण जैन नेताजी, मनोज जैन वाकलीवाल, जगदीश प्रसाद जैन, जितेंद्र जैन, दीपक जैन, रोहित जैन, आशु जैन वी.के., आयुष जैन सहित समाजजन मौजूद रहे।

21 सितंबर को उत्तम संयम धर्म की आराधना

मीडिया प्रभारी राहुल जैन ने बताया कि 21 सितंबर को सुबह 7 बजे निर्मल सेवा सदन में मुनि समत्वसागर जी के सान्निध्य में उत्तम संयम धर्म की आराधना के साथ अभिषेक, पूजन एवं विधान होगा।