बांसवाड़ा। “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहना और सुनना सरल है, लेकिन इसे जीवन में उतारना साधना का विषय है। दशलक्षण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना के अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, अडिंदा में गणिनी आर्यिका रत्न श्री सुभूषणमति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रावकों को क्रोध की उग्रता कम कर क्षमा का अभ्यास करने की प्रेरणा दी।

गुरु परंपरा गौरव, वात्सल्य वारिधि, आगमिक प्रखर वक्ता, चर्या शिरोमणि गणिनी आर्यिका रत्न श्री सुभूषणमति माताजी यहां अपने 42वें अभिनंदनीय वर्षायोग के लिए ससंघ विराजमान हैं।

‘दशलक्षण के 10 दिन श्रावक के लिए धर्म की ट्रेनिंग’

माताजी ने कहा कि जिस प्रकार किसी विभागीय कार्य अथवा डिग्री के लिए प्रशिक्षण लेना पड़ता है, उसी प्रकार श्रावक के लिए पर्युषण-दशलक्षण पर्व के दस दिन धर्म की ट्रेनिंग के समान हैं। उन्होंने कहा कि श्रावक प्रयास करके क्षमा धर्म का पालन कर सकता है, जबकि ‘उत्तम’ विशेषण महामुनियों की अपेक्षा से है। मन, वचन और काय की गुप्तिपूर्वक क्षमा धारण करना उत्तम क्षमा है। गृहस्थ को भी अपने जीवन में क्षमा धारण करने का निरंतर अभ्यास करना चाहिए।

‘क्षमा का विपरीत क्रोध, कषाय को करें मंद’

माताजी ने कहा कि क्षमा का विपरीत क्रोध है। कोई व्यक्ति जानबूझकर क्रोध नहीं करना चाहता, लेकिन विपरीत परिस्थितियों और कारणों के निमित्त से गृहस्थ जीवन में क्रोध उत्पन्न हो जाता है। क्रोध के समय मनुष्य कई बार स्वयं पर नियंत्रण खो देता है। आंखें लाल होना, शरीर कांपना और मन का अशांत होना उसकी उग्रता को दर्शाता है। क्षमा धारण करके कषायों को मंद किया जा सकता है।

क्रोध आए तो णमोकार मंत्र की ओर लगाएं ध्यान

माताजी ने क्रोध को नियंत्रित करने का व्यावहारिक उपाय बताते हुए कहा कि क्रोध की स्थिति में कुछ क्षण के लिए सामने वाले व्यक्ति और उसके विचारों से अपना ध्यान हटाकर णमोकार मंत्र का पाठ करें उन्होंने कहा कि क्रोध को जीतने का प्रयास करते हुए उसकी उग्रता को कम करें और क्षमा धारण करें। इससे धीरे-धीरे क्रोध शांत होगा और क्षमा का गुण प्रकट होगा, जो परंपरा से मोक्षमार्ग का कारण बनता है।

‘क्रोध को दबा देना हमेशा क्षमा नहीं’

माताजी ने क्षमा और विवशता के अंतर को भी समझाया। उन्होंने कहा कि किसी बलवान अथवा प्रभावशाली व्यक्ति के सामने परिणामों के भय से क्रोध को दबा लेना वास्तविक क्षमा नहीं, बल्कि कई बार अपनी सुरक्षा का उपाय हो सकता है। अंतरंग भावों की विशुद्धि के साथ विरोधी के प्रति भी करुणा रखते हुए क्रोध न करना क्षमा है। माता-पिता और गुरुजनों जैसे उपकारी व्यक्तियों के प्रति क्रोध नहीं करना भी जीवन में धर्मभाव को मजबूत करता है।

‘ज्ञात से अज्ञात को जानना सीखने का आधार’

माताजी ने कहा कि उत्तम क्षमा धर्म के दिन क्रोध की चर्चा इसलिए की जाती है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति क्रोध से परिचित है। ज्ञात से अज्ञात को जानना ही सीखने का मूल आधार है। क्षमा को समझने के लिए उसके विपरीत क्रोध की प्रकृति को समझना आवश्यक है।

उन्होंने मंगल भावना व्यक्त की कि जिस प्रकार मुनिराज उत्तम क्षमा को धारण करते हैं, उसी दिशा में श्रावक भी अपने सामर्थ्य के अनुसार आगे बढ़ें। प्रवचन के बाद श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ गुरु मां के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। कार्यक्रम संबंधी जानकारी अंजली जैन, खतौली, मुजफ्फरनगर ने दी।