आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी वर्तमान में शिखर संत हैं: आचार्यश्री ने साधकों को दीक्षा देकर मोक्ष मार्गी बनाया

इंदौर के सुमतिधाम में चल रहे पट्टाचार्य महोत्सव में साधुओं के दर्शन से सकल जैन समाज कृतार्थ हो रहा है। आचार्यश्री विशुद्धसागर जी का पट्टाचार्य पदारोहण 30 अप्रैल को होने जा रहा है। इस अवसर पर आचार्यश्री के गुणानुवाद भक्त जन कर रहे हैं। छत्रपति संभाजीनगर के नरेंद्र अजमेरा ने यहां अपने विचार व्यक्त किए हैं। छत्रपति संभाजी नगर से पढ़िए, अभिषेक पाटील की यह खबर...
छत्रपति संभाजीनगर। संसार की सभी संस्कृतियों में जैन संस्कृति प्राचीन है। इस सम्यक पुरुषार्थ प्रधान जैन संस्कृती में अनेक महापुरुषांे ने जन्म लेकर पुरुषार्थ के बल पर तथा उज्ज्वल चरित्र को धारण कर संसार के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत किया। उनकी साधना कथनी की एकता ने सारे विश्व को ज्ञान से आलोकित किया है तथा परमात्म पद को प्राप्त किया। इन महापुरुषों, साधु-संतों की श्रेणी में जैन धर्म की आस्थाओं को जोड़ने वाले महायोगी, जन-जन को सन्मार्ग बताने वाले सन्यासी, अध्यात्म पद के सच्चे उपासक, आत्मान्वेषी, संत शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी वर्तमान में शिखर संत हैं एवं इस धरती पर साक्षात चलते-फिरते देवता हैं। यह बात नरेंद्र अजमेरा ने कही। श्रमण संस्कृति के ज्योतिर्मय नक्षत्र आचार्य श्री इस भवसागर में स्वयं भी तरते हैं और दूसरों को भी तार रहे हैं। आप नौका के समान हैं। आपने अब तक अनेक साधकों को दीक्षा देकर मोक्ष मार्गी बनाया है। अनेक बाल ब्रह्मचारी युवा दिगंबर मुनि, अनेक शिष्य समुदाय आपके आंतरिक वात्सल्य से परिपूरित हैं और आपकी संघ संचालक की कुशलता का परिचायक है। इसलिए तो कहते हैं कि कुशल शिल्पी के हाथ पत्थर लग जाए तो वह मूर्ति बन जाती है। बीज को कुशल माली मिल जाए तो वह वट वृक्ष में रूपांतरित हो जाता है। वैसे ही पतन में डूब रही युवा पीढ़ी और समाज को आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के वाणी का सहारा मिल जाए तो उनके जीवन की दशा और दिशा ही बदल जाती है।आचार्यश्री विरागसागर जी ने समाज को अनमोल हीरा सौंपा अजमेरा ने कहा कि जिसमें पृथ्वी की क्षमा, आकाश की निर्मलता, चंद्रमा की शीतलता और सागर से गंभीरता है। जिनका आदर्श हिमालय से टक्कर लेता है। जिनका जीवन ज्ञान दिवाकर के रश्मियों से अलौकिक है। ऐसे निष्काम साधक, प्रेरणा स्रोत, युग सर्वस्व, शुद्धात्मध्यानी, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र जैसे अनमोल रत्नों को अपने अंतरात्मा में छुपाए हुए रत्नाकर को दीक्षा गुरु आचार्यश्री विरागसागर जी ने समाधि मरण के पूर्व ही अपना उत्तरदायित्व को सौंपकर समाज के लिए एक अनमोल हीरा सौंपा है। जिनके नेतृत्व में अब जैन धर्म एक नई ऊचाई धारण कर सारे विश्व में जिन शासन की पताका को युगों युगों तक फहराते रहेगा।
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