इंदौर। तप, त्याग, ज्ञान और साधना से आलोकित आचार्य श्री सुनीलसागर जी का जीवन अनगिनत भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी धर्मप्रभावना, प्राकृत भाषा के संरक्षण और समाज में संस्कार एवं सदाचार के प्रसार की यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रहे। गुरुदेव के चरणों में नमन करते हुए 49वें अवतरण दिवस पर कोटिशः वंदन एवं मंगलकामनाएं। आचार्य आदिसागर अंकलीकर परंपरा के चतुर्थ पट्टाधीश, प्राकृताचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज का जीवन तप, साधना, अध्ययन, साहित्य सृजन, धर्मप्रभावना और समाज जागरण का अद्भुत समन्वय है। उनका व्यक्तित्व केवल एक साधु या आचार्य के रूप में नहीं, बल्कि एक चिंतक, दार्शनिक, साहित्यकार, समाज सुधारक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में भी विशिष्ट पहचान रखता है। आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज का पूर्व नाम संदीप था। उनका जन्म 7 अक्टूबर 1977 को विक्रम संवत 2034 की आश्विन कृष्ण दशमी को मध्यप्रदेश के सागर जिले के तिगोड़ा (हीरापुर के पास)में हुआ। धार्मिक संस्कारों से संपन्न परिवार में जन्मे आचार्य श्री के माता-पिता धर्मनिष्ठ श्रावक परिवार से थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिगोड़ा की पाठशाला से हुई, जिसे उस समय दादाजी मदरसा कहा करते थे। इसके बाद उन्होंने किशुनगंज तथा दमोह के नन्हियाल में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने सागर के श्री गणेशप्रसाद वर्णी संस्कृत महाविद्यालय में अध्ययन किया।
बाल्यकाल से ही साहित्य, वाद-विवाद और नेतृत्व में रुचि
आचार्य श्री के व्यक्तित्व की विशेषता रही कि विद्यार्थी जीवन से ही उनमें कविता, गीत, लेखन, भाषण, वाद-विवाद तथा कार्यक्रमों के आयोजन और संयोजन की विशेष रुचि थी। खेलों में भी वे कबड्डी, क्रिकेट और फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी रहे। अध्ययन के साथ-साथ उनकी वैचारिक क्षमता और नेतृत्व गुण लगातार विकसित होते गए। शास्त्री की शिक्षा पूर्ण करने के बाद संसार की अनित्यता, सत्संग और आध्यात्मिक ज्ञान ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वैराग्य की भावना प्रबल हुई और उन्होंने सांसारिक जीवन से विरक्त होकर संयम एवं साधना के मार्ग को अपनाने का निर्णय लिया।
20 वर्ष की आयु में लिया संयम का मार्ग
आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ने 20 अप्रैल 1997, महावीर जयंती के दिन, लगभग 20 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के कछुआ सागर, झांसी में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया। इसके बाद आचार्य श्री सम्मतिसागर जी महाराज, अंकलीकर परंपरा के तृतीय पट्टाचार्य के सान्निध्य में उनका आध्यात्मिक जीवन और अधिक प्रखर हुआ।
उनका दीक्षा नाम ‘मुनि श्री सुनीलसागर’ रखा गया। अल्पायु में ही उन्होंने कठिन संयम, अध्ययन, स्वाध्याय और साधना को जीवन का आधार बनाया। गुरु के सान्निध्य में उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और अपनी प्रतिभा को धर्म एवं समाज के कल्याण के लिए समर्पित किया।
गुरु ने पहचानी विलक्षण प्रतिभा 2007 में आचार्य पद पर पदारोहण
आचार्य श्री सम्मतिसागर जी महाराज ने अपने शिष्य सुनीलसागर जी की विलक्षण मेधा, असाधारण प्रतिभा, मृदुभाषिता, प्राकृत एवं हिंदी भाषा पर अधिकार, साहित्यिक क्षमता, गुरु के प्रति श्रद्धा, संघ के प्रति वात्सल्य और कुशल नेतृत्व क्षमता को प्रारंभ से ही पहचान लिया था। 25 जनवरी 2007, माघ शुक्ल सप्तमी, संवत 2064 को औरंगाबाद में गुरु आचार्य श्री सम्मतिसागर जी महाराज ने उन्हें आचार्य पद पर पदारोहित किया। इसके बाद कुंजनवन में अनंतीवीर भगवान को गुरु आज्ञा से सुमिरन करते हुए आचार्य श्री ने गुरु परंपरा के उत्तरदायित्व को संभाला। गुरु के समाधि लेने के पश्चात 26 दिसंबर 2010 को कुंजनवन में गुरु द्वारा पूर्व में दिए गए लिखित आदेशानुसार आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज के लिए पट्टाचार्य पद की घोषणा की गई। उसी दिन मुंबई के घाटकोपर क्षेत्र में विशाल जनसभा एवं भक्तों की उपस्थिति में उनका गरिमामय पट्टाचार्य पद पदारोहण समारोह हुआ। उन्हें आदिसागर अंकलीकर परंपरा का चतुर्थ पट्टाचार्य घोषित किया गया।
तप, विहार और कठिन परिस्थितियों में भी साधना
आचार्य श्री का जीवन निरंतर विहार, साधना और धर्मप्रभावना से जुड़ा रहा है। कठिन परिस्थितियों में भी वे संयम और धैर्य के साथ अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहे। उनके जीवन परिचय में लगातार कई दिनों तक अंतराय आने पर भी समता धारण करने तथा अंतराय की स्थिति में भी लगभग 30 किमी तक विहार करने जैसी तपस्या और सहनशीलता का उल्लेख मिलता है।वर्षों की साधना के दौरान उन्होंने अनेक कठिन परीषहों को सहन करते हुए संयम जीवन की मर्यादाओं को दृढ़ता से निभाया। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में तप, त्याग और आत्मविश्वास का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
प्राकृत भाषा साहित्य के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान
आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज की पहचान एक प्राकृताचार्य और बहुभाषाविद् साहित्यकार के रूप में भी है। उन्होंने हिंदी और प्राकृत सहित विभिन्न भाषाओं में विपुल साहित्य का सृजन एवं मार्गदर्शन किया। उनके द्वारा लिखित एवं प्रेरित साहित्य में गद्य, पद्य, उपन्यास, यात्रा-वृत्तांत, जीवनगाथा और आध्यात्मिक ग्रंथ शामिल हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में ‘अनूठा तपस्वी’, ‘विजय का सूर्य एवं जैन धर्म जानिये’ जैसे ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। प्राकृत भाषा में भी उन्होंने अनेक ग्रंथों का लेखन एवं प्रकाशन कराया। ‘सुनील प्राकृत समग्र’ में प्राकृत भाषा की अनेक रचनाओं का संग्रह किया गया है।
आचार्य श्री की प्रेरणा से अनेक पुस्तकों का कन्नड़, मराठी, अंग्रेजी, गुजराती, ब्राह्मी, प्राकृत सहित विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। उनके साहित्य के माध्यम से जैन दर्शन, प्राकृत भाषा और आध्यात्मिक चिंतन को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने का कार्य निरंतर जारी है।
धर्म के साथ समाज सुधार को भी बनाया जीवन का लक्ष्य
आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज के जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रहा। वे आत्मकल्याण के साथ समाजकल्याण को भी समान महत्व देते हैं। उनके जीवन लक्ष्यों में समाज में सुधार, अहिंसा, शाकाहार और सदाचार का प्रचार-प्रसार, नारी शक्ति को आगे लाना, युवा पीढ़ी में संस्कार निर्माण, बालिकाओं के व्यक्तित्व विकास में सहयोग तथा समाज में जीवन मूल्यों की स्थापना प्रमुख हैं। वे लोगों को स्वाध्याय, वाचन और अध्ययन के लिए प्रेरित करते हैं तथा अपने प्रवचनों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों के स्थान पर विवेक, सदाचार और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ावा देने का संदेश देते हैं।
संघ संगठन और युवा शक्ति को दिशा
पट्टाचार्य पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद आचार्य श्री ने संघ के संगठन और अनुशासन को मजबूत करने के साथ युवाओं को धर्म एवं संस्कारों से जोड़ने पर विशेष बल दिया। उनके सान्निध्य में साधु-साध्वियों का विशाल संघ धर्मविहार कर रहा है। उन्होंने स्वयं अनेक मुनियों एवं आर्यिकाओं को दीक्षित कर श्रमण परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान दिया है। उनके जीवन परिचय में वर्तमान संघ में बड़ी संख्या में साधु-साध्वियों तथा ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों के धर्ममार्ग पर आगे बढ़ने का उल्लेख मिलता है। संघ में अनुशासन, साधना, स्वाध्याय और परस्पर वात्सल्य को वे विशेष महत्व देते हैं।
धर्मप्रभावना के विविध माध्यम
आचार्य श्री की धर्मप्रभावना केवल प्रवचनों तक सीमित नहीं है। उनके मार्गदर्शन में धार्मिक गोष्ठियां, संस्कार शिविर, शिक्षण शिविर, ग्रीष्मकालीन एवं वर्षाकालीन विशेष वाचन, श्रावकों के आग्रह पर विशेष ग्रंथ वाचन, सर्वधर्म सम्मेलन तथा ब्राह्मी एवं प्राकृत भाषा गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। उन्होंने 50 पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं, वेदी प्रतिष्ठाओं, मंदिर, संत निवास और स्कूल की भूमि पूजन जैसी धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भी मार्गदर्शन दिया है। विभिन्न स्थानों पर मंदिर निर्माण, संत निवास तथा धार्मिक संस्थाओं के विकास में भी उनकी प्रेरणा का उल्लेख मिलता है।
देशभर में बनी विशिष्ट पहचान
आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज को उनके अनुयायी एक महान चिंतक, दार्शनिक, आध्यात्मिक संत, प्राकृताचार्य और समाज सुधारक के रूप में देखते हैं। उनकी विशेष पहचान प्राकृत भाषा में सहज एवं प्रभावशाली प्रवचन करने वाले संत के रूप में भी है। वे कठिन आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा में समझाने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके जीवन परिचय में यह भी उल्लेख है कि विभिन्न धर्मों के ग्रंथों का उन्होंने गहन अध्ययन किया है तथा समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग उनसे प्रभावित होकर मार्गदर्शन प्राप्त करने आते हैं। मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री, सांसद, शासकीय अधिकारी और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उनके चरणों में पहुंचकर आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन लेते रहे हैं।
ज्योतिष, वास्तु और विविध क्षेत्रों में भी गहरी रुचि
आचार्य श्री को ज्योतिष एवं वास्तु विज्ञान का भी ज्ञान है। मंदिर एवं मूर्ति निर्माण से संबंधित वास्तु की जानकारी के साथ-साथ हस्तरेखा के क्षेत्र में भी उनकी विशेष रुचि का उल्लेख मिलता है। उनके जीवन में विविध विषयों के अध्ययन और ज्ञान को धर्म एवं समाजोपयोगी दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
‘निष्काम योगी’ के रूप में जीवन की पहचान
आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज का संपूर्ण जीवन साधना, त्याग, आत्मकल्याण और लोककल्याण की भावना से प्रेरित रहा है। उनके जीवन का लक्ष्य साधना के माध्यम से सिद्धत्व की ओर बढ़ना, साधु-साध्वियों को आत्मसाधना में सहयोग देना, समाज को मुक्ति की दिशा में प्रेरित करना, शास्त्रों के अध्ययन और वाचन के लिए लोगों को जागृत करना तथा अहिंसा, शाकाहार और सदाचार को जन-जन तक पहुंचाना है।
उनकी प्रेरणा से अनेक धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन
साहित्य सृजन, प्राकृत भाषा का संरक्षण, संस्कार निर्माण और सामाजिक जागरण के कार्य हुए हैं। तप, त्याग, ज्ञान, साहित्य, संगठन, समाजसेवा और आध्यात्मिक चेतना—इन सभी आयामों का समन्वित रूप ही आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज के व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है। इसी कारण वे आज जैन समाज के साथ-साथ युवा पीढ़ी के बीच भी एक प्रेरणास्रोत संत के रूप में अपनी प्रभावशाली पहचान बना चुके हैं।




