आज समूचा विश्व मातृ वंदना कर रहा है। मातृ वंदना के लिए संदर्भ की नहीं सदभाव की जरूरत है क्योंकि, मां ममत्व, त्याग, समर्पण और दृढ़ता की प्रतिमूर्ति है। मां अद्भुत है। मां स्वयं प्रकृति है। जिसके न होने पर भी आशीष की अविरल वर्षा से जीवन धन्य हो, वह आशीष सदैव उपकृत करता है। यह मैंने भी अनुभूत किया है। मां को प्रणाम करते हुए पढ़िए, एडवोकेट सारिका जैन शास्त्री की यह कविता...

एक अल्हड़ सी, नाजुक सी,प्यारी सी गुड़िया

जिसको ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया था

आज हर समय वो मेरा हाथ थामे रहती है स

बिना बोले ही हर बात जान लेती है स

जानती है कि

उसकी एक मुस्कान से दिन बन जाता है मेरा

सो मेरे साथ हँसने, बतियाने वक्त निकाल ही लेती है

कभी जिसकी चोटी बनाकर स्कूल भेजती थी

आज वह मेरे बाल संवारती है

क्या पहनना, क्या खाना, हर बात यूँ बतलाना

जैसे मेरी ही माँ बन गयी हो वो

सच ही तो कहते है लोग

कि माँ को भी माँ की जरूरत होती है

सो भगवान बेटी को भेज देते है माँ के पास

देख उसे यकीं होता

कि कैसे एक गुड़िया बेटी से सखी और सखी से माँ जैसी बन गयी

सच में एक नन्ही परी

नव विस्तार बन गयी...

नव विस्तार बन गयी...

 

- सारिका जैन (शास्त्री), एडवोकेट।