श्रीफल की विशेष श्रृंखला में आज मिलिए मंडलेश्वर के नयन जैन परिवार से। यहां दशलक्षण की शुरुआत सुबह 5:30 बजे योग-ध्यान से होती है और दिन अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय व प्रवचन के साथ आगे बढ़ता है। खास बात यह है कि घर से दूर मुरादाबाद में पढ़ रही बेटी तनीषा भी परिवार से मिले संस्कारों को निभाते हुए उपवास की साधना कर रही है।
दशलक्षण पर्व के दस दिन किसी परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदलाव लाते हैं? सुबह की शुरुआत कैसे होती है, भोजन की मर्यादा कितनी बढ़ती है और घर से दूर पढ़ने वाले बच्चे अपने नियम कैसे निभाते हैं?
इन्हीं सवालों को लेकर श्रीफल साथी सन्मति जैन काका ने मंडलेश्वर मुनि सेवा समिति के अध्यक्ष नयन जैन से बातचीत की। नयन जैन बताते हैं कि उनके परिवार में धर्म-साधना सामान्य दिनों में भी जीवन का हिस्सा है, लेकिन दशलक्षण आते ही समय, भोजन और भाव—तीनों में संयम और बढ़ जाता है।
संतों का सान्निध्य मिला तो परिवार में गहरे होते गए संस्कार
नयन जैन बताते हैं कि परिवार को आचार्य श्री विद्यासागर महाराज, आचार्य श्री वर्धमानसागर महाराज, निर्यापक मुनि श्री 108 नियमसागर महाराज ससंघ, मुनि श्री 108 प्रयोगसागर महाराज, मुनि श्री 108 प्रबोधसागर महाराज और आर्यिका श्री 105 पूर्णमती माताजी का सान्निध्य मिला है।
वर्ष 2023 के चातुर्मास में मुनि श्री प्रयोगसागर महाराज की पुरानी पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य भी परिवार को मिला। नयन जैन मानते हैं कि संतों का यह सान्निध्य केवल याद बनकर नहीं रहा, बल्कि परिवार की दिनचर्या और बच्चों के संस्कारों में भी उतरता गया।
सुबह 5:30 बजे योग-ध्यान, फिर मंदिर में अभिषेक-पूजन
दशलक्षण में परिवार का दिन सुबह करीब 5:30 बजे योग और ध्यान से शुरू हो जाता है। इसके बाद परिवार के सदस्य मंदिर पहुंचते हैं, जहां अभिषेक, पूजन और पाठ के साथ धर्म-साधना आगे बढ़ती है।
मंदिर की धार्मिक क्रियाएं पूरी होने के बाद ही भोजन किया जाता है। सामान्य दिनों में भी सात्त्विक भोजन रहता है, लेकिन पर्व के दौरान भोजन की शुद्धता और मर्यादा पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
परिवार में हर सदस्य अपनी शक्ति और भावना के अनुसार एकासन, उपवास और भोजन संबंधी नियम लेता है। शाम छह बजे के बाद पानी का भी त्याग रहता है।
मुरादाबाद में पढ़ रही तनीषा ने चार उपवास कर बताया—संस्कार जगह से नहीं बदलते
नयन जैन परिवार की दशलक्षण दिनचर्या में बड़ी बेटी तनीषा जैन की साधना खास ध्यान खींचती है।
तनीषा घर से दूर मुरादाबाद की तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही हैं। परिवार साथ नहीं है और पढ़ाई की अपनी दिनचर्या है, इसके बावजूद उन्होंने दशलक्षण में अब तक चार उपवास की साधना की है।
यह परिवार के लिए इसलिए भी विशेष है क्योंकि घर से दूर होने के बाद नियम निभाने के लिए माता-पिता की निगरानी नहीं, बल्कि स्वयं की श्रद्धा और संस्कार काम आते हैं।
नयन जैन कहते हैं कि बच्चों को घर में जैसा धार्मिक वातावरण मिला, वही अब उनके अपने निर्णयों में दिखाई देता है।
छोटी बेटी प्रणया और पत्नी सोनिका भी साधना में शामिल
घर की छोटी बेटी प्रणया जैन ने भी एक उपवास की साधना की है। वहीं नयन जैन की पत्नी सोनिका जैन ने भी एक उपवास किया है और आगे भी अपनी क्षमता के अनुसार साधना जारी रखने का भाव रखा है।
परिवार में यह जरूरी नहीं माना जाता कि सभी एक जैसा तप करें। कोई उपवास करता है, कोई एकासन और कोई भोजन की मर्यादा बढ़ाता है। महत्वपूर्ण यह है कि हर सदस्य अपनी शक्ति के अनुसार इन दस दिनों में संयम को जीवन में स्थान दे।
शाम को फिर जुड़ जाता है पूरा परिवार धर्म से
सुबह योग-ध्यान और अभिषेक-पूजन से शुरू हुई धार्मिक दिनचर्या शाम को प्रवचन के साथ आगे बढ़ती है।
इन दिनों मंडलेश्वर में पूज्य आर्यिका श्री 105 लक्ष्मीभूषण माताजी का चातुर्मास चल रहा है। परिवार उनके प्रवचनों का लाभ लेता है। इस तरह सुबह से शाम तक अलग-अलग धार्मिक गतिविधियां परिवार को धर्म से जोड़े रखती हैं।
घर से दूर गए बच्चे, लेकिन साथ गए संस्कार
नयन जैन परिवार की कहानी में बच्चों से जुड़ी एक सहज बात सामने आती है—बच्चे हमेशा घर में नहीं रहेंगे, लेकिन घर में मिले संस्कार उनके साथ जा सकते हैं।
तनीषा का मुरादाबाद में पढ़ाई करते हुए उपवास करना हो या बच्चों का बाहर रहकर भी रात्रि भोजन त्याग, देवदर्शन और सात्त्विक भोजन की मर्यादा बनाए रखना, यह उसी पारिवारिक वातावरण का प्रभाव है जिसे उन्होंने बचपन से देखा है।
धर्म जब घर की रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बनता है तो बच्चों के लिए भी वह केवल पर्व के दिनों में याद आने वाली बात नहीं रहता।
दस दिन—नियमों के साथ संस्कारों को और मजबूत करने का समय
नयन जैन मानते हैं कि दशलक्षण हर वर्ष परिवार को अपने नियमों की ओर फिर से देखने का अवसर देता है। इन दस दिनों में पूजा, उपवास, एकासन या भोजन की मर्यादा जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण अपने भीतर संयम का भाव बढ़ाना है।
उनके परिवार की दिनचर्या भी यही दिखाती है—संतों से मिले संस्कार माता-पिता के जीवन में आए और वही संस्कार अब बच्चों की अपनी साधना में दिखाई दे रहे हैं।
मंडलेश्वर से मुरादाबाद तक दूरी जरूर है, लेकिन धर्म के संस्कारों की डोर नहीं टूटी। घर में मिली सीख अब बच्चों के अपने नियम और अपनी साधना बन रही है।
श्रृंखला का उद्देश्य
श्रीफल की विशेष ‘दशलक्षण और निमाड़ के परिवार’ श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, सामान्य दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा घर से मिले धर्म और संयम के संस्कार अगली पीढ़ी तक कैसे पहुंचते हैं।
कल फिर मिलेंगे निमाड़ के एक और परिवार से और जानेंगे कि दशलक्षण के दस दिनों में उनके घर की दिनचर्या और बच्चों के नियमों में क्या बदलाव आता है।
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