जब तक आत्मा में शुद्धि के परिणाम नहीं होगे अर्थात् परिणामों में विशुद्धि नहीं होगी तब तक किसी भी प्रकार का धर्म प्रगट नहीं हो सकता है। शौच धर्म लोभ-कषाय के अभाव में प्रगट होता है। आचार्यों ने लोभ को पाप का बाप कहा है क्योंकि, प्राणी लोभ के वशीभूत होकर के ही पापों को करता चला जाता है एवं अपने आपको दुर्गति का पात्र बना लेता है। आशाओं से परिपूर्ण व्यक्ति सदैव ही लोभवृत्ति को प्राप्त होता है। संतोषी प्राणी सदैव पुण्य का बंध करता है एवं पापों से दूर रहता है। यही उत्तम शौच धर्म है। शुचि का जो भाव शौच वो ही, मन से सब लोभ दूर करना। निर्लोभ भावना से नित ही, सब जग को स्वप्न सदृश गिनना।
संतोषी प्राणी सदैव पुण्य का बंध करता है : उत्तम शौच धर्म पर प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन ने दी शिक्षा

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