धरियावद। नगर में चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर महा आराधना के तेईसवें दिन चार पुण्यार्जक परिवारों सहित अन्य श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भक्तामर विधान में भाग लिया। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान एवं भक्ति के साथ मंडप पर भक्तामर विधान के 48 अर्घ्य समर्पित किए।विधान की आराधना के पश्चात आचार्य कल्पपुण्य सागर जी महाराज ने प्रवचन माला में पिछले दिन के विषय “किम् अमृतम्?” अर्थात अमृत क्या है? की व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जीवन में कभी-कभी एक छोटा-सा शब्द भी अमृत का काम कर जाता है। संतों के प्रेरणादायी शब्द व्यक्ति के जीवन की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं।

त्याग के बल पर स्वयं को ऊंचा उठा सकता है

आचार्यश्री ने कहा कि जब भी व्रत ग्रहण करें, उसे दो व्यक्तियों की साक्षी में लें और अपने संकल्प को स्पष्ट रूप से सबके सामने रखें। इसके पीछे गहरा रहस्य है। मन कभी चंचल होकर व्रत तोड़ने की ओर प्रेरित कर सकता है। ऐसे समय व्रत का साक्षी बना मित्र हमें हमारे संकल्प की याद दिलाकर संयम के मार्ग पर बनाए रखता है उन्होंने कहा कि व्रत केवल संकल्प लेने का नाम नहीं, बल्कि उस संकल्प को जीवन में दृढ़ता से निभाने का नाम है। साक्षी के साथ लिया गया व्रत व्यक्ति के आत्मबल को मजबूत करता है और उसे अपने लक्ष्य से विचलित होने से बचाता है। आचार्यश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि मनुष्य अपने संयम, तप और त्याग के बल पर स्वयं को ऊंचा उठा सकता है। आवश्यकता केवल दृढ़ संकल्प, आत्म-जागृति और सतत पुरुषार्थ की है।

त्याग के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया

क्रांतिकारी राष्ट्रसंत तरुण सागर जी महाराज के प्रेरणादायी प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एक छोटा-सा प्रेरक शब्द भी व्यक्ति के भीतर ऐसा परिवर्तन ला सकता है कि वह उसी क्षण गलत आदत का त्याग कर दे। प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के संदेश को आत्मसात करते हुए संयम, व्रत और त्याग के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।