सीकर। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संयमी जीवन का 58वां वर्षायोग सीकर में 40 साधुओं सहित कर रहे हैं। आचार्य श्री पारस भवन दंग की नसिया में संघ सहित विराजित हैं। 16 कारण पर्व प्रारंभ होने वाले हैं। अनेक महाव्रती अणुव्रती श्रावक-श्राविका शक्ति अनुसार संयम तप करेंगे। चतुर्दशी होने से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सहित अनेक साधुओं के उपवास रहे।

आर्यिका श्री पूर्णिमा मति माताजी ने किए केशलोच
आचार्य श्री की शिष्या आर्यिका श्री पूर्णिमा मति माताजी ने 26 अगस्त को केशलोचन किया। कैशलोचन के बारे में आर्यिका श्री विनम्र मति माताजी ने बताया कि दिगंबर साधु को दो से चार माह के बीच अनिवार्य रूप से केशलोचन करना होता है क्योंकि, ज्यादा समय होने से बालों में सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति हो सकती है। केशलोच हाथ से करते समय केवल राख का उपयोग किया जाता है। यह साधु के तप संयम का अंग है श्राविकाएं वैराग्य के भजनों से तपस्या की अनुमोदना करती हैं।
आहार की अनुमोदना करने से भी पुण्य मिलता है
आचार्य धर्मसागर सभागृह में प्रातः कालीन उपदेश में मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने बताया कि देव शास्त्र गुरु सभी प्राणियों को आत्म कल्याण का मार्ग दिखाते हैं। चार प्रकार के दान की चर्चा में बताया कि आहार दान देने से सभी चारों दान का लाभ मिलता है। आहार दान देने से, आहार देखने से उसकी अनुमोदना करने से भी पुण्य मिलता है। वर्तमान बुफे भोजन को गिद्ध भोजन की उपमा देते हुए बताया कि भोजन और पानी की शुद्धता नहीं होने से अनेक बीमारी फैलती है।
जिनवाणी पर सच्चा श्रद्धान जरूरी
भगवान के दर्शन ,विनय ,समर्पण और भक्ति से करना चाहिए। मन से राग द्वेष दूर होने पर ही गुरु का उपदेश जिनवाणी श्रवण करने का लाभ होता है। गुरु की वाणी जिनवाणी पर सच्चा श्रद्धान जरूरी है।






