सीकर। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 40 साधुओं सहित सीकर में विराजित हैं। दिगंबर जैन समाज सीकर द्वारा 16 कारण भावना पर्व प्रारंभ हुआ। श्री जी के अभिषेक के बाद इसकी विशेष पूजन की गई। पारस भवन दंग की नसिया में आचार्य श्री धर्मसागर सभागृह में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में बताया कि चातुर्मास पर्व में अनेक पर्व आए और आगे भी पर्व आएंगे। इसके पूर्व आपने गुरु पूर्णिमा, वीर शासन जयंती और अन्य पर्व मनाए हैं। आज से 16 कारण पर्व प्रारंभ हुआ। यह पर्व 32 दिनों का है। यह पर्व वर्ष में तीन बार भाद्र ,चैत, और माघ माह में आता है। पर्व का जीवन में विशेष महत्व होता है। पर्व से जीवन में परिवर्तन आता है। दर्शन विशुद्धि भावना, विनय सम्पन्नता , शीलव्रतेष्वनतीचार अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग, संवेग,शक्तितस्त्याग ,शक्तितस्तप ,साधुसमाधि , वैयावृत्, अर्हद्भक्ति आचार्यभक्ति . बहुश्रुतभक्ति . प्रवचनभक्ति ,. आवश्यकापरिहारिणी ,. मार्गप्रभावना . प्रवचनवात्सल्य भावना 16 भावना पर प्रतिदिन संघ द्वारा उपदेश दिया जाएगा।
रक्षा बंधन दिवस का लौकिक राखी से ज्यादा आध्यात्मिक महत्व
पर्व आध्यात्मिक होते हैं,इन आध्यात्मिक पर्वों का संबंध आत्मा से होता है। यह पर्व आत्मा पर लगे कर्म बंधनों को छुड़ाने का संदेश और प्रेरणा देते हैं अभी आपने दर्शन विशुद्धि भावना का श्रवण किया। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 16 कारण भावना की प्रवचन माला में प्रथम दर्शनविशुद्धि भावना पर व्यक्त की। डॉ. राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि पूनम पर वात्सल्य रक्षा बंधन दिवस का लौकिक राखी से ज्यादा आध्यात्मिक महत्व है।
दृष्टि की निर्मलता ही सम्यक दर्शन
आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व आर्यिका श्री महायश मति माताजी ने अपने उपदेश में बताया कि भावना अनेक प्रकार की होती है वैराग्य भावना, 12 भावना, 16 कारण भावना,मेरी भावना, भावना से मन में शांति ,शक्ति मिलती है। जैन धर्म भाव प्रधान धर्म है।दर्शनविशुद्धि भावना की विवेचना में माताजी ने बताया कि दर्शन से अभिप्राय भगवान के दर्शन के साथ साथ भगवान के प्रति श्रद्धा प्रतीति ,और अंतर्दृष्टि श्रद्धा से होती हैं विशुद्धि सच्चे देव ,शास्त्र, गुरु सात तत्वों पर श्रद्धान करने से आती है। माताजी ने सम्यक दर्शन के आठ दोषों की विवेचना में बताया की दृष्टि की निर्मलता ही सम्यक दर्शन है। दृष्टि में निर्मलता आने पर विशुद्धि होती है दृष्टि बदलने से सृष्टि बदल जाती है।






