इंदौर। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर दलाल बाग, छत्रपति नगर में मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस के रूप में भव्य रक्षाबंधन विधान संपन्न हुआ। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में हुए इस आयोजन में ‘रक्षा-वंदन करो, श्रमण संस्कृति रक्षक जयवंत हो’ के जयघोषों से पूरा पंडाल गूंज उठा।
700 मुनिराजों के उपसर्ग का प्रसंग
धर्मसभा में पूज्य गुरुदेव ने आचार्य अकंपनाचार्य सहित 700 मुनिराजों पर आए भयंकर उपसर्ग का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि धर्म, साधु-संतों और श्रमण संस्कृति की रक्षा का संदेश देने वाला पर्व है।
अहंकार नहीं, संयम को दें स्थान
गुरुदेव ने हजारों की संख्या में उपस्थित समाजजनों को संबोधित करते हुए जीवन में ‘Ego Point’ और ‘Prestige Point’ नहीं बनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि परिवार और समाज में अहंकार को प्राथमिकता देने से संबंधों में दरार आती है। हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं, कई लड़ाइयों से दूर रहना ही सबसे बड़ी जीत है। दुष्टता का उत्तर दुष्टता से नहीं, बल्कि संयम और विवेक से देना चाहिए।
धर्म रक्षा का सामूहिक संकल्प
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में लाखों श्रीफल समर्पित किए और श्रमण संस्कृति तथा देव-शास्त्र-गुरु की रक्षा का सामूहिक संकल्प लिया। दलाल बाग परिसर में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का एक साथ विधान में बैठना आयोजन का विशेष आकर्षण रहा।
धर्म प्रभावना समिति की सहभागिता
धर् प्रभावना समिति की ओर से सपनामनीष गोधा सहित आयोजन से जुड़े पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने व्यवस्थाओं में सहभागिता की। श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और भक्ति के साथ विधान में भाग लेकर रक्षाबंधन पर्व को धर्मरक्षा के संकल्प से जोड़ा।
अद्भुत और ऐतिहासिक दृश्
लाखों श्रीफलों से सजा दलाल बाग परिसर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। बड़ी संख्या में समाजजनों की सहभागिता और सामूहिक संकल्प ने आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया। रक्षाबंधन के माध्यम से श्रमण संस्कृति की रक्षा का संदेश जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।
धर्म और संस्कृति की रक्षा का संदेश
पूरे आयोजन का मूल संदेश यही रहा कि पर्व केवल परंपरा निभाने का अवसर नहीं, बल्कि अपने धर्म, संस्कार और संस्कृति के प्रति कर्तव्य को याद करने का अवसर हैं। रक्षाबंधन को श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस के रूप में मनाते हुए श्रद्धालुओं ने धर्म और साधु-संतों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।



