मुरैना। जैनाचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ, कर्मकांड अथवा बाहरी आडंबर का विषय नहीं है, बल्कि आत्मा का स्वाभाविक गुण है। यदि जीवन का लक्ष्य शाश्वत सुख, आत्मकल्याण और मोक्ष की प्राप्ति है, तो उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग भी श्रेष्ठ होना चाहिए और वह मार्ग सम्यक् धर्म का मार्ग है।
आत्मा के वास्तविक स्वरूप की पहचान जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव स्वभाव से शुद्ध, बुद्ध और आनंदमय आत्मा है, लेकिन राग, द्वेष, मोह और कषायों के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर संसार के दुःखों में भटकता रहता है। धर्म का उद्देश्य बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा के स्वभाव में स्थित होना है। सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र को जीवन में धारण करने से वास्तविक धर्म का उदय होता है।
श्रेष्ठ लक्ष्य के लिए श्रेष्ठ साधन जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि संसार के भौतिक साधन, पद, प्रतिष्ठा और वैभव क्षणिक सुख प्रदान कर सकते हैं, लेकिन स्थायी शांति, आत्मिक आनंद और निर्भयता धर्म के आचरण से ही प्राप्त होती है। धर्म मनुष्य को क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना सिखाता है तथा संयम, क्षमा, दया, करुणा और समता जैसे गुणों का विकास करता है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में श्रेष्ठ परिणाम चाहता है, लेकिन श्रेष्ठ फल केवल श्रेष्ठ साधनों से ही प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार उत्तम बीज से ही उत्तम वृक्ष उत्पन्न होता है, उसी प्रकार उत्तम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए धर्ममय जीवन, सदाचार, संयम और आत्मचिंतन का मार्ग अपनाना आवश्यक है। धर्म जीव को मिथ्यात्व के अंधकार से निकालकर आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।
सांसारिक संबंध कर्मों के अधीन : मुनिश्री उपशांतसागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री 108 उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि संसार में आत्मा के अतिरिक्त अपना कोई नहीं है। जैन दर्शन के अनुसार माता-पिता, पुत्र, परिवार, धन-संपत्ति और अन्य सभी सांसारिक संबंध कर्मों के निमित्त हैं। कर्मों का संयोग रहने तक ही इन संबंधों का अस्तित्व दिखाई देता है और कर्मों का वियोग होते ही सभी संबंध स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि विवेकी पुरुष को मोह-ममता और परिग्रह में उलझने के बजाय आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होना चाहिए। धर्म का वास्तविक उद्देश्य बाहरी आडंबर या धार्मिक क्रियाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, कषायों का क्षय और सम्यक् दृष्टि का जागरण है।
आत्मसंयम और स्वाध्याय को बनाएं जीवन का अंग
मुनिश्री ने कहा कि जब मनुष्य राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर आत्मचिंतन, आत्मसंयम और स्वाध्याय को जीवन का अंग बनाता है, तभी उसके भीतर धर्म का वास्तविक उदय होता है।
प्रतिदिन हो रही धर्मसभा और गुरु भक्ति
धर्मसभा का संचालन जैन विद्वान नवनीत जैन शास्त्री ने किया। उन्होंने बताया कि नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर, मुरैना में जैनाचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज अपने पांच शिष्यों सहित वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से आचार्यश्री एवं मुनिश्री 108 उपशांतसागर जी महाराज के प्रेरणादायी प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं।
प्रश्न मंच में हर्षित गुंजन जैन प्रथम
सायंकालीन कार्यक्रमों का संचालन डॉ. मनोज जैन द्वारा किया जाता है। प्रतिदिन प्रश्न मंच, मंगल आरती, गुरुभक्ति एवं वैयावृत्ति का आयोजन किया जाता है। शुक्रवार को आयोजित प्रश्न मंच प्रतियोगिता में हर्षित गुंजन जैन ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्हें सम्मानपूर्वक पुरस्कार प्रदान किया गया।



