इंदौर। चतुर्थ पट्टाचार्य प्राकृताचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री सम्बुध्द सागर जी महाराज एवं मुनि श्री सुविवेक सागर जी महाराज का भव्य मंगल प्रवेश मंगलवार को प्रातः श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर समर्थ सिटी में हुआ। समाजजनों ने की मुनि द्वय की भव्य आगवानी की। जगह-जगह पर समाजजनों ने मुनि द्वय के पाद प्रक्षालन करके आशीर्वाद प्राप्त किया। पुरुष वर्ग ध्वज और महिलाएं मंगल कलश लेकर आगे आगे चल रही थी। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी एवं समाज प्रमुख शैलेश चंदेरिया ने बताया कि आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज से समाजजन द्वारा निवेदन किया गया था कि संघस्थ मुनिराज को दशलक्षण महापर्व के अवसर पर समर्थ सिटी प्रवास की स्वीकृति प्रदान करने का आशीर्वाद प्रदान करें। ऐसी समाजजन की भावना है। आचार्य श्री ने समाजजन के निवेदन पर मुनिद्वय को भिजवा कर कॉलोनी निवासियों पर बहुत-बहुत अनुकंपा की। इस अवसर पर शैलेन्द्र चंदेरिया ने अपनी बात रखी।

जब चेतना जागृत हो जाएं तब सहीं दिशा में कदम बढ़ा लेना

मुनि द्वय ने कॉलोनी ‍में प्रवेश के बाद संक्षिप्त उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में और हमारे जीवन में तुरन्त कुछ नहीं होता है। कई जन्मों की भटकन के बाद हमें मनुष्य जन्म मिला है। पहले हमने श्रावकों के व्रत धारण करें फिर क्षुल्लक ऐलक दीक्षा ग्रहण की, फिर मुनि दीक्षा हुई। अब भी हमें बहुत इंतजार करना होगा। अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और आप सभी को भी इसी क्रम में आगे बढ़ना होगा। यह एक क्रम है। अतः जब चेतना जागृत हो जाएं तब सहीं दिशा में कदम बढ़ा लेना ही बुद्धिमानी है।

वर्द्धमान महावीर की यह परंपरा आज 2500 वर्ष पश्चात भी जारी

जरा इतिहास कि ओर जाने का प्रयास करते हैं आज से 2000 वर्ष पूर्व यदि कुंदकुंद स्वामी मुनि दीक्षा नहीं ग्रहण करते और अपना अभूतपूर्व प्रज्ञा द्वारा आगम का सृजन नहीं करते, अपने शिष्य नहीं बनाते तो फिर बीसवीं सदी में आचार्य श्री शांतिसागर (द्वय) आचार्य श्री आदि सागर अकलिंकर जैसे महान आचार्य भगवंत हमें नहीं मिलते। वर्तमान में आचार्य भगवंतांे का डंका नहीं बजता और आज हम आपके सामने नहीं होते। कहने का आशय इस काल खंड में प्रथम तीर्थेश आदि जिन से वर्द्धमान महावीर की यह परंपरा आज 2500 वर्ष पश्चात भी अक्षुण्ण रूप से निर्बाध चल रही है। आज आपके जीवन में धर्म है, मंदिर है, महाराज है इस अनमोल अवसर का सभी को लाभ लेना चाहिए

बुधवार से राष्ट्रीय त्योहार दशलक्षण महापर्व होगा प्रारंभ

मुनि श्री ने बताया कि आज बीसवीं सदी के महान आचार्य श्री आदि सागर अकलिंकर स्वामी जी की जन्म जयंती भी है। उनके जीवन का एक प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने बताया कि एक समय की घटना है जब अपने गृहस्थ जीवन में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने आचार्य श्री आदि सागर जी अकलिंकर को एक समय अपने कंधों पर बिठा कर नदी पार करवाईं थी। ऐसे महान आचार्य भगवंतांे को हमारा कोटि-कोटि नमन। बुधवार से जैन समाज का राष्ट्रीय त्योहार दशलक्षण महापर्व प्रारंभ हो रहा है। सभी अपनी अपनी शक्ति अनुसार व्रत उपवास एवं छोटे छोटे नियम लेकर धर्म आराधना के इस महापर्व का भरपूर लाभ लें यही हमारी मंगल भावना है।