कुण्डलपुर। धर्म की महानता इसी में है कि अपनी आपत्ति-विपत्ति को समता और शांति से सहन किया जाए, लेकिन दूसरों पर आई आपत्ति-विपत्ति को देखकर शांत और चुप न बैठा जाए, बल्कि उनकी सहायता और संरक्षण के लिए तत्पर हुआ जाए। यह उद्गार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने रक्षाबंधन वात्सल्य पर्व के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।मुनि श्री ने कहा कि अपनी पीड़ा पर तो कोई भी आँसू बहा लेता है और अपनी पीड़ा से पशु भी कराह उठता है, लेकिन जो पराई पीड़ा पर अपनी आँखों से नीर बहा दे, वह केवल इंसान नहीं,बल्कि धरती पर रहने वाला देवता है। अपनी पीड़ा में सुदृढ़ बने रहना और दूसरों की पीड़ा को देखकर द्रवित होकर उनकी सहायता के लिए आगे आना धर्म की गहराई और सूक्ष्मता को प्रकट करता है। संत और नवनीत में यही अंतर है। नवनीत अपने ऊपर आई हुई आँच से पिघलता है, जबकि संत अपने ऊपर आई कठिनाइयों में सुदृढ़ रहते हैं और दूसरों पर आई विपत्ति देखकर द्रवित हो जाते हैं।

आचार्य श्री कहते थे—हाँ, ठीक हो जाएगा

मुनि श्री ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन का स्मरण करते हुए कहा कि उनके जीवन में बड़ी से बड़ी बाधाएँ आईं, स्वास्थ्य प्रतिकूल हुआ और अनेक बीमारियाँ आईं, लेकिन अपनी बीमारी और व्याधि में वह अत्यंत मजबूत दिखाई दिए। आचार्य श्री कहते थे—हाँ, ठीक हो जाएगा। सब ठीक हो जाएगा। कोई सेवा करने जाये तो कह देते नहीं-नहीं, कोई जरूरत नहीं। मुनिश्री ने कहा कि अपनी परेशानियों में आचार्य श्री मजबूत और कड़क दिखते थे, लेकिन संघ के किसी साधु, त्यागी-व्रती, आर्यिका, मुनि, आचार्य या पिच्छीधारी को कोई असुविधा हो जाए और उसका समाचार उन्हें मिल जाए तो वे तुरंत द्रवित होकर उनकी कुशल क्षेम की चिंता करते थे। वे आवश्यक निर्देश देकर सहायता और संरक्षण की व्यवस्था कराते थे।

करुणा योग्यता देखकर नहीं, पीड़ा देखकर जागती है

मुनि श्री ने कहा कि सामान्य गृहस्थ भी यदि व्यापार की परेशानी, बीमारी, वृद्धावस्था या विकलांगता से पीड़ित होकर आचार्य श्री की दृष्टि में आ जाता, तो वे तुरंत रुककर उसे करुणा और आशीर्वाद प्रदान करते थे। अपरिचित व्यक्ति भी यदि किसी परेशानी में होता और आचार्य श्री की नजर उस पर पड़ जाती, तो वे अपनी करुणा बरसाते थे। करुणा योग्यता देखकर नहीं, पीड़ा देखकर जागती है। उन्होंने कहा कि कुण्डलपुर महामहोत्सव जैसे अत्यंत व्यस्त अवसरों पर भी जैन और जैनतर बंधु यदि आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त करने की भावना से आते थे, तो ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब संदेश पहुँचाकर उन्हें आशीर्वाद दिलाया गया और आचार्य श्री ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी करुणा प्रदान की।

सुखी रहे सब जीव जगत के, कोई कभी न घबराए

मुनि श्री ने कहा कि करुणा का विस्तार सभी प्राणियों तक होना चाहिए। रक्षाबंधन का यह पर्व सभी में करुणा, स्नेह और वात्सल्य जगाए, ताकि परिवार, रिश्तेदार, समाज तथा जैन-जैनतर सभी समुदाय एक-दूसरे के प्रति सद्भाव रखें और सहयोग के लिए तत्पर रहें।उन्होंने कहा कि प्रत्येक प्राणी में करुणा, वात्सल्य और स्नेह का संचार हो। हम प्रतिदिन प्रातःकाल संपूर्ण प्राणी-जगत के प्रति यह भावना करें—“सुखी रहे सब जीव जगत के, कोई कभी न घबराए, बैर, पाप, अभिमान छोड़ जग, नित नए मंगल गाए। घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जाए,ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना, मनुष्य जन्म फल सब पाए।

सहयोग और संवेदना का संकल्प लेना चाहिए

मुनि श्री ने कहा कि जिस प्रकार णमोकार मंत्र हमारे परिणामों को शुद्ध करता है, उसी प्रकार यह भावना भी हमारे परिणामों को शुद्ध करेगी। इससे प्रकृति का वातावरण हरा-भरा होगा, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और लोगों में सद्भावना का संचार होगा।उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन का पर्व सांस्कृतिक विरासत और भावनाओं से आगे बढ़कर सामाजिक स्वरूप ग्रहण कर चुका है। बहन भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधकर स्नेह और विश्वास व्यक्त करती है, वहीं भाई भी सदैव बहन का साथ देने और उसकी रक्षा करने का संकल्प लेता है। मुनि श्री ने कहा कि भाई-बहन के बीच रक्षाबंधन की यह परंपरा अब एक व्यापक सामाजिक भावना बन गई है। इसका विस्तार परिवार तक सीमित न रहकर समूचे समाज और सभी समुदायों तक होना चाहिए। हमें एक-दूसरे की रक्षा, सम्मान, सहयोग और संवेदना का संकल्प लेना चाहिए। यही रक्षाबंधन पर्व की वास्तविक सार्थकता और धर्म की सच्ची महानता है।

700 मुनिराजों को अर्घ्य समर्पित किए

उपरोक्त जानकारी राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावानी, एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज,ने देते हुये बताया इस अवसर पर रक्षाबंधन विधान संपन्न हुआ जिसमें अकंपनाचार्य आदि 700 मुनिराजों को अर्घ्य समर्पित किए गए। भक्तामर महामंडल विधान,बडे बाबा के चरणों का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई । इस अवसर पर मुनि श्री पवित्रसागर जी, ऐलक श्री निश्चय सागर जी, ऐलक श्री निजानंदसागर जी ,ऐलक श्री चैत्यसागर जी महाराज सहित समस्त ऐलक क्षुल्लक महाराज संघ सहित विराजमान थे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त,कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी पदाधिकारी सदस्यों की उपस्थिति रही।