भारतीय संस्कृति अत्यंत ही प्राचीन संस्कृति है। जहाॅं पर विभिन्न धर्म एवं जाति के लोग निवास करते हैं। जोकि अनेकता में एकता का दिग्दर्शन कराती है। भारत में मनाये जाने वाले प्रत्येक त्योहार के पीछे एक इतिहास एवं घटना जुड़ी होती है, जो हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्मृतियों को ताजा करती है। यह एक सुन्दर परम्परा है, जिसके माध्यम से संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। हम अपने पूर्वजों की उस परम्परा को त्योहार के माध्यम से पुनः याद करते हैं एवं उस पर्व को मनाकरके पूर्वजों को श्रद्धांजलि समर्पित करते हैं

महापर्व एक वात्सल्यता का प्रतीक

इसी प्रकार से रक्षाबंधन का महापर्व एक वात्सल्यता का प्रतीक है। इसमें सारे देश और विदेश के अंदर बहने अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं एवं भाईयों के द्वारा रक्षा का संकल्प दिया जाता है बहनों के लिए। जो बहने अपने भाईयों से दूर रहती हैं। अन्य शहरों या प्रांतों में वे भी अपने भाईयों के लिए राखियाॅं भेजती हैं।

संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्द्धन

यह पर्व दूसरों के दुख में सम्मिलित होने का पर्व है। अपनी पीढ़ा से पशु पक्षी भी कराह उठते हैं। लेकिन इंसान पर पीढ़ा से सिहर उठे वह धरती पर देवता के समान है। भारत त्योंहारों का देश है त्योहारों के माध्यम से संस्कृति को संरक्षण एवं संवर्द्धन प्रदान किया जाता है। रक्षाबंधन पर्व भारतीय संस्कृति का सबसे महान पर्व है क्योंकि किसी पर्व में हम घर को सजाते हैं तो किसी त्योंहार में नये कपड़े पहने की परम्परा है किन्तु रक्षाबंधन ही एक मात्र पर्व है जो हमें दूसरों के प्रति वात्सल्य एवं करूणा का संदेश देता है।

एक सूत्र में बंधने की आवश्यकता

महिलायें समाज का अभिन्न अंग है। इनके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसके बाद भी कुछ दूषित मानसिकता वाले पुरुषों व मनचले युवकों द्वारा पूरी महिला समाज भय और आतंक के माहौल में जीने को मजबूर हैं। आज बलात्कार व छेड़छाड़ की घटनायें सुनने एवं देखने को टीवी एवं दैनिक पत्रों के माध्यम से प्रतिदिन मिलती है। यह पर्व हमें पुनः जागृत करने एवं संस्कृति से जोड़ने के लिए आता है। महिलाओं की इज्जत एवं अपनी बहिन बेटियों की सुरक्षा के लिए समाज के सभी वर्ग के लोगों को एक सूत्र में बंधने की आवश्यकता हैै तभी हम पुनः एक सभ्य और सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति में बहन बेटियों को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती व देवी का दर्जा दिया जाता है। नवरात्रों में हम बालिकाओं को बुला करके भोजन कराके व उनके चरणों की पूजा करके अपने व्रत की पूर्ति करते हैं।

जैन मुनि उपसर्ग समझ करके ध्यान में लीन हो गए

प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन ने बताया कि जैन धर्म में रक्षाबंधन पर्व का महत्व बहुत ही विशेष है। जैन मान्यता के अनुसार यह पर्व संस्कृति और धर्म की रक्षा का पर्व है एक समय हस्तिनापुर नगरी में अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनियों के ऊपर बली आदि चार मंत्रियों ने भीषण उपसर्ग किया। जहां मुनिराज संघ विराजमान था एवं ध्यान साधना में लीन था। तब उन मंत्रियों ने मौका देखकर उनके चारों ओर से घेर करके अग्नि प्रज्वलित कर दी एवं इसे हवन का नाम देकर के उन पर प्राणघाती उपद्रव किया। जैन मुनि उपसर्ग समझ करके ध्यान में लीन हो गये एवं उपसर्ग निवारण होने तक अन्न-जल आदि चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दिया। उसी समय विष्णु कुमार मुनि जो कि तपस्या में लीन थे उन्हें क्षुल्लक पुष्पदंत महाराज ने सम्बोधन किया कि हे महामुनि हस्तिनापुर नगरी में 700 मुनियों के ऊपर घोर उपसर्ग किया जा रहा है जिसका निवारण इस समय सिर्फ आपके द्वारा ही हो किया जा सकता है। चूंकि आपको तप करते-करते अनेक प्रकार की ऋद्धियाॅं प्राप्त हो चुकी हैं जिनके माध्यम से आप तत्क्षण वायु मार्ग से जा करके उनकी रक्षा कर सकते हैं।

मुनि बामन ने धरती दो पैर में ही नाप ली

बिना समय गंवाए विष्णुकुमार मुनि बामन (ब्राह्मण) का रूप धर करके हस्तिनापुर नगरी में पहुॅंच जाते हैं एवं उच्च स्वर से संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करने लग जाते हैं। बामन का आकषर्ण रूप देखकर चारों मंत्री उन पर मुग्ध हो जाते है एवं उनसे मन चाहा वरदान मांगने का निवेदन करते हैं। बामन राज वरदान में तीन पैर धरती मांग लेते हैं। वो चारों मंत्री मन ही मन सोचते हैं कि बामन चाहता तो इस समय हम से पूरा गांव मांग सकता था लेकिन, मात्र तीन पैर धरती ही मांग रहा है। उन्होंने निवेदन किया बामनराज आप अपने पैरों से ही तीन पग धरती नाप लें। अपनी शक्तियों से विष्णुकुमार मुनि ने इतना बड़ा आकार बनाया कि पहला पैर सुमेरू पर्वत पर दूसरा पैर मानुषोत्तर पर्वत पर रखा। तीसरा पैर रखने की जगह नहीं बची पूरी धरती दो पैर में ही नाप ली। वे सभी हाहाकार करने लगे। हे भगवन हमारी रक्षा कीजिए अपने वास्तविक रूप में आ करके हमें दर्शन दीजिए।

समय से यह रक्षा बंधन महापर्व मनाया जाने लगा

उस समय महामुनि विष्णुकुमार ने संबोधन दिया कि तुम्हारा यज्ञ व्यर्थ है। जिसमें तुम इन मुनियों को जिन्दा जला रहे हो एवं हिंसा कर रहे हो उसी समय उन मंत्रियों ने अपने अपराध की क्षमा मांगी और महामुनि विष्णुकुमार मुनि के द्वारा उन 700 मुनियों की रक्षा की गई एवं सभी ग्राम वासियों ने आ करके उन सभी मुनियों को बचा करके उनकी यथा योग्य सेवा की एवं धुंए से कंठ रुंध गया था इसलिए मीठी सिवई की खीर बना करके सभी साधुओं को आहार कराया। उसी समय से यह रक्षा बंधन महापर्व मनाया जाने लगा। वह दिन श्रावण शुक्ला पूर्णिमा का पावन दिवस था।

वर्तमान में यह पर्व भाई-बहनों तक ही सीमित रह गया। इस दिन बहनें अपने भाईयों को रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं और वे उसके फलस्वरूप उन्हें उपहार व राशि प्रदान करते हैं। लेकिन इस त्योंहार से जुड़े हुए इतिहास को नहीं जान पाते हैं यह त्यौहार वात्सल्य एवं रक्षा का पर्व है जो हमें भाईचारे का संदेश देता है कि हमें सर्वप्रथम अपने राष्ट्र, राज्य, ग्राम की रक्षा का संकल्प लेना है तत्पश्चात् एक दूसरे की रक्षा का संकल्प लें। उसके पश्चात् अपने घर में इस पर्व को मनाकरके खुशहाली लायें यही इस पर्व का संदेश है। स्वयं जिये और दूसरों को जीने दें।