इंदौर। आचार्य श्री सुनीलसागरजी के सानिध्य में श्री श्रेयांसनाथ भगवान के निर्वाण कल्याणक एवं आचार्य श्री अकंपनाचार्य के उपसर्ग विजय दिवस के साथ रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया गया। गुरुदेव ने कहा रक्षाबंधन केवल कच्चे धागों से बनी पक्की डोर का पर्व नहीं, बल्कि त्याग, वात्सल्य, प्रेम और धर्म की रक्षा का संदेश देने वाला पावन पर्व है। जैन परंपरा में रक्षाबंधन का यह पर्व भगवान श्रेयांसनाथ के निर्वाण कल्याणक, आचार्य श्री अकंपनाचार्य के उपसर्ग विजय तथा मुनिराज विष्णुकुमार के अद्भुत त्याग और वात्सल्य की पावन स्मृति से जुड़ा हुआ है और रक्षाबंधन पर्व के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राखी केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म, वात्सल्य और त्याग की उस भावना की प्रतीक है, जो संकट के समय किसी की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करने की प्रेरणा देती है।
रक्षाबंधन पर्व को विशेष आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करता है
आचार्य श्री ने बताया कि रक्षाबंधन हमें आचार्य श्री अकंपनाचार्य के उपसर्ग और मुनिराज विष्णुकुमार के महान त्याग की याद दिलाता है। जब 700 मुनिराजों पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, तब विष्णुकुमार मुनिराज ने अपने त्याग और सामर्थ्य से उनके संकट को दूर करने का मार्ग अपनाया। उनका यह वात्सल्य, त्याग और धर्म के प्रति समर्पण आज भी रक्षाबंधन पर्व को एक विशेष आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करता है।
भाई की दीर्घायु की कामना और बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक
रक्षाबंधन के माध्यम से इतिहास हमें यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम केवल शब्दों और रिश्तों तक सीमित नहीं होता, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर किसी के संकट को अपना समझकर उसके लिए खड़े होने में है। यही कारण है कि जैन समाज में यह पर्व वात्सल्य, त्याग और धर्मरक्षा की भावना को जागृत करने वाला पर्व बन गया है। आचार्य श्री ने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि राखी प्रेम की वह डोर है, जो रिश्तों को जोड़ती है। यह भाई की दीर्घायु की कामना और बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। उन्होंने रक्षाबंधन के भाव को प्रस्तुत करते हुए कहा—
राखी कच्चे धागों से बनी पक्की डोर है,
राखी प्यार और मीठी शरारतों की होड़ है।
राखी भाई की लंबी उम्र की दुआ है,
राखी बहन के पवित्र प्यार की दुआ है।
श्रावकों ने आकर्षक राखियां तैयार कीं
इस अवसर पर भगवान श्रेयांसनाथ का निर्वाण कल्याणक भी श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। भगवान के निर्वाण कल्याणक के अवसर पर श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक लड्डू अर्पित कर निर्वाण लाडू चढ़ाया और भगवान के चरणों में श्रद्धा समर्पित की। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने राखी बनाओ प्रतियोगिता में उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिता की विशेषता यह रही कि प्रतिभागियों को स्वयं अपने हाथों से राखी बनानी थी। श्रावक-श्राविकाओं ने अपनी रचनात्मकता और धार्मिक भावनाओं को राखियों में पिरोते हुए बेहद सुंदर और आकर्षक राखियां तैयार कीं। प्रतियोगिता ने पूरे आयोजन में उत्साह और उमंग का वातावरण बना दिया।
आचार्य श्री अकंपनाचार्य की उपसर्ग विजय को स्मरण किया
रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर चारों ओर खुशियों की बौछार दिखाई दी। भाई-बहन के प्रेम के साथ-साथ श्रद्धालुओं ने विष्णुकुमार मुनिराज के त्याग, 700 मुनिराजों के प्रति उनके वात्सल्य और आचार्य श्री अकंपनाचार्य की उपसर्ग विजय को स्मरण किया।
सचमुच, रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने का पर्व नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला पर्व है कि जब धर्म और साधु-संतों पर संकट आए, तब उनके प्रति वात्सल्य और समर्पण की भावना ही सच्ची रक्षा है। यही त्याग, वात्सल्य और धर्मरक्षा की भावना रक्षाबंधन को भारत और विशेष रूप से जैन समाज के लिए एक अनूठा और प्रेरणादायी पर्व बनाती है।


