मुरैना। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में रक्षाबंधन महामण्डल विधान के दौरान धर्म और भक्ति का वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से जिनेन्द्र भगवान का पूजन-अर्चन किया तथा विधान के माध्यम से आत्मशुद्धि और कर्मक्षय की भावना को जागृत किया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने रक्षाबंधन के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए 700 मुनिराजों की रक्षा और उनकी अद्भुत आत्मसाधना का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग हमें केवल किसी की बाहरी रक्षा करने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि अपनी आत्मा की रक्षा करने का संदेश भी देता है। आचार्यश्री ने कहा कि आत्मा को बचाना ही सबसे बड़ी रक्षा है। बाहर की वस्तुओं की रक्षा करने के लिए हम अनेक उपाय करते हैं, लेकिन अपनी आत्मा को कषायों से बचाने का प्रयास बहुत कम करते हैं। क्रोध आत्मा को जलाता है, मान उसे अहंकार में बांधता है, माया छल-कपट की ओर ले जाती है और लोभ मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं होने देता। इन कषायों से आत्मा की रक्षा करना ही सच्चे अर्थों में धर्म की रक्षा है।

विधान केवल अनुष्ठान नहीं, आत्मशुद्धि की साधना

रक्षाबंधन महामण्डल विधान के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्यश्री ने कहा कि विधान को केवल परंपरा अथवा धार्मिक आयोजन मानकर पूरा कर लेना पर्याप्त नहीं है। विधान का वास्तविक उद्देश्य अपने भीतर झांकना और आत्मा को शुद्ध करने का पुरुषार्थ करना है। जिनेन्द्र भगवान का पूजन करते समय केवल हाथों से पूजा न हो, बल्कि मन के भाव भी निर्मल हों। स्वाध्याय करते समय केवल शब्दों का ज्ञान न हो, बल्कि जीवन में उसका प्रभाव दिखाई दे। भगवान के सामने दीपक जलाते समय अपने भीतर के अज्ञान का अंधकार दूर करने का संकल्प होना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर केवल एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प न लें, बल्कि अपनी आत्मा को पाप से, मन को कषायों से और जीवन को अधर्म से बचाने का संकल्प लें। यही रक्षाबंधन की वास्तविक सार्थकता है।

आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ें

इस अवसर पर मुनिश्री उपशांत सागर जी ने कहा कि शरीर नश्वर है, संसार परिवर्तनशील है और बाहरी संबंध भी स्थायी नहीं हैं। स्थायी है तो केवल आत्मा और उसका शुद्ध स्वरूप। इसलिए जीवन का परम उद्देश्य आत्मकल्याण होना चाहिए। रक्षाबंधन का पर्व हमें इसी आत्मकल्याण, संयम, तप और धर्म की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि धर्म की शरण में रहने वाला व्यक्ति परिस्थितियों से नहीं हारता, क्योंकि उसकी शक्ति बाहर नहीं, भीतर होती है। इसलिए विधान के माध्यम से अपने भीतर धर्म का दीप जलाएं, कषायों को कम करें और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ें। यही 700 मुनिराजों की साधना को सच्ची श्रद्धांजलि और रक्षाबंधन पर्व का वास्तविक संदेश है।

मुनिराजों की पिच्छी में राखी बांधने का सौभाग्य

रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। परम पूज्य मुनिराजों की पिच्छी में राखी बांधने का सौभाग्य श्रद्धालुओं ने बोली के माध्यम से प्राप्त किया। प्रथम राखी बांधने का सौभाग्य दिनेश कुमार जैन एवं मनीष जैन वरैया परिवार ने प्राप्त किया। द्वितीय राखी बांधने का सौभाग्य पदम चन्द्र गौरव कुमार जी जैन (चेंटा) परिवार ने प्राप्त किया ।श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मुनिराजों की पिच्छी में राखी बांधकर धर्म एवं साधु-संतों के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।

निर्वाण लाडू समर्पित कर किया पुण्यार्जन

भगवान श्रेयांशनाथ के मोक्ष कल्याणक के पावन अवसर पर भगवान के चरणों में निर्वाण लाडू समर्पित करने का सौभाग्य राजकुमार जैन एवं गौरव कुमार जैन (सीए) ने प्राप्त किया। निर्वाण लाडू समर्पित करते समय श्रद्धालुओं ने भगवान श्रेयांशनाथ के मोक्ष कल्याणक की जय-जयकार की, जिससे मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठा। धार्मिक गरिमा के साथ हुआ कार्यक्रम का संचालन सम्पूर्ण कार्यक्रम का सुव्यवस्थित एवं प्रभावी संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री एवं मनोज जैन द्वारा किया गया। दोनों ने कार्यक्रम को धार्मिक गरिमा एवं उत्साह के साथ आगे बढ़ाते हुए श्रद्धालुओं को विभिन्न धार्मिक प्रसंगों एवं आयोजनों से जोड़े रखा।