Muni_Shri_Samatva_Sagar_Ji_made_the_religious_assembly_aware_of_various_aspects_of_life.

सारांश:-

आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में मुनि श्री समत्व सागर जी ने मंगलवार को प्रवचन में अपनी अमृतमयवाणी में कहा कि कौन सा शब्द, छोटा सा है, 'पता नहीं'। यह 'पता नहीं' जो बोलते हैं ना बार-बार, उनके अंदर में डर अपने आप स्थापित होता जाता है। और वह डर उस आगे के बढ़ने वाले कदमों को लड़खड़ा देता है। कहीं गिर तो नहीं जाऊंगा? बच्चे क्यों गिर जाते हैं, पता है? बच्चे वही जब तक चलना नहीं सीखे, तब तक क्यों नहीं चल पाए? चलना तो आता था, क्योंकि एक दिन पहले तक नहीं चल रहा था और एक दिन बाद चल रहा है। चलना तो आता था, लेकिन डर था, 'गिर गया तो?' हां? 'गिर गया तो?' एक वे लोग हैं जो भविष्य को लेकर देखते हैं कि 'हां, गिर नहीं जाऊं' और अभी संभल के चलते हैं। एक दूसरे वे लोग हैं, 'पता नहीं गिर गया तो?' इसलिए अभी ही चलने में लड़खड़ा जाते हैं।

हम सीखते नहीं हैं, इसलिए दोहराते हैं

मुनि श्री ने कहा कि बच्चे सीखते हैं, हां? जब बालक छोटा सा होता है ना, घुटने टेक कर चलता है, घुटने के बल चलता है, तो चलते-चलते कई बार गिरता है। लेकिन हर गिरने पर वह सीखता जाता है। हर गिरने पर वह कुछ सीख लेता है कि 'पिछली बार ऐसा ही कदम रखा था, इसलिए गिर पड़ा था।' या तो अगर डर बैठ गया उसके अंदर में, तो वह चलना ही नहीं चाहता उस दिशा में। किसी दिन पलंग से गिर जाए ना, दौड़ते-कूदते, या किसी दिन दीपक के पास बैठा हो और अग्नि में हाथ चला जाए, पहले तो बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन एक बार चला जाए गलती एक बार हुई है, तो अगली बार अब वह जैसे ही दीपक देखता है ना, तुरंत भागता है। क्यों? जल चुका है, उसके साथ में घटना घट चुकी है। वह बालक कितना समझदार है कि एक बार जलने के बाद दूसरी बार सावधान रहता है लेकिन, हम बड़े होने पर भी क्या उस बालक से भी गए-बीते नहीं हो गए हैं? वही-वही काम करते हैं! वही-वही काम करते हैं जिसमें हमें कष्ट होता है, अथवा जिसमें हमने सीख ग्रहण नहीं की और वही काम करते हैं। आप लोग नहीं करते होंगे ना? अगर सीखते जाते ना, तो वही-वही चीजें नहीं दोहराई जातीं। हम सीखते नहीं हैं, इसलिए दोहराते हैं और इसलिए जीवन दोहराते हैं।

कितने लोग दुखियाराम हैं? कितने लोग सुखियाराम हैं?

पंडित जी, हमने सीखना प्रारंभ नहीं किया, इसलिए गलती पर गलती करते हैं। और गलती के साथ अगर सीखते जाते तो फिर गलती नहीं दोहराते। और जब गलती नहीं दोहराते, तो मेरे दुख के दिन नहीं आ सकते थे। मैं वही दोहराता हूं जो मेरे दुख का कारण है। सब सुख तो चाहते हैं। अच्छा, यहां कितने लोग हैं जो सुख नहीं चाहते? एक व्यक्ति को भी सुख की खोज थी। एक व्यक्ति को सुख की खोज थी वह चाहता था कि मुझे सुख मिले। वह दुनिया में निकल पड़ा, 'मुझे सुखी व्यक्ति को खोजना है, उससे मैं कुछ उससे मैं कुछ सीखूंगा कि आखिर सुखी सुखी कैसे रहा जाता है।' और वह निकल गया और जैसे भी आज की भाषा में कहें तो किसी एक इन्फ्लुएंसर के पास पहुंच गया। प्रेरणादायी व्यक्तित्व, प्रभावी व्यक्तित्व के पास पहुंच गया कि 'मैं सुखी व्यक्ति की खोज कर रहा हूं। पूर्व की भाषा में कहें तो इन्हीं व्यक्तियों को, जो थोड़ी बौद्धिक क्षमताओं वाले थे, तो दार्शनिक कहे जाते थे। जो दर्शन पक्ष को, अर्थात बुद्धि का प्रयोग करके ऐसे स्थानों पर अपनी बुद्धि लगाते थे जहां पर सामान्य लोगों की बुद्धि नहीं चलती, ऐसा दार्शनिक के पास वह खड़ा हो गया और पूछने लगा, 'भाई, मेरी खोज है सुखी व्यक्ति को मैं खोजना चाहता हूं, आप मेरी क्या मदद कर सकते हैं?' मदद क्या आप मुझे कोई मंत्र दे सकते हैं जिससे मैं भी सुखी हो जाऊं? सुखी हो जाऊं, कोई मंत्र आपके पास है कि कोई मंत्र ऐसा हो कि मेरा जीवन सुखी हो जाए?' अब देखना, आप भी यही करते हैं। हम लोगों के पास जब आते हैं, तो आप क्या मांगते हैं? मंत्र ही तो मांगते हैं कि 'मेरे जीवन के कष्ट दूर हो जाएं, परेशानियां दूर हो जाएं, मेरे जीवन में दुख न आएं और सुखी जीवन हो जाए।' आप परेशान हैं अभी, सुखी हैं कि दुखी? कितने लोग दुखी हैं? कितने लोग दुखियाराम हैं? कितने लोग सुखियाराम हैं? अरे, 'आए राम, गए राम' हैं! कुछ पता ही नहीं है क्या हो रहा है! भैया, इतना तो पता करके रखो कि सुखी हो कि दुखी हो!

स्वास्थ्य भी आपके पास है, अच्छे उच्च कुल में जन्मे हैं

मुनि श्री ने कहा कि तो फिर आप अगर अपने आप को दुखी मानते हो अच्छा, आप लोग दुखी हो कि सुखी, एक बार फिर से बता दो? इसके अलावा मुझे लगता नहीं है, जीवन में दो ही चीजें हैं। कई कुछ लोग बोलते हैं, 'हम सुखी भी नहीं हैं, दुखी भी नहीं हैं।' इनकी बुद्धि ही नहीं चलती कि सुख किसे कहते हैं, दुख किसे कहते हैं। तो आपके जीवन में कौन सी कमी है, यह बता दीजिए मुझे? घर आपके पास है, पैसे आपके पास हैं, स्वास्थ्य भी आप यहां पर जितने दिखाई दे रहे हैं, स्वास्थ्य भी आपके पास है, अच्छे उच्च कुल में जन्मे हैं, पहनने और खाने की व्यवस्थाएं सब आपके पास हैं... फिर आप दुखी तो नहीं हैं ना? आप सब सुखी हैं ना l मंच संचालन पंडित विजय शास्त्री जी ने किया।

मुनि श्री का पाद प्रक्षालन कर चित्र अनावरण किया

पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के शिष्य श्रमण मुनि श्री समत्व सागर जी, श्रमण मुनि श्री शील सागरजी, श्रमण मुनि श्री सुप्रभात सागर जी ससंघ के सानिध्य में धर्म सभा का शुभारंभ पदाधिकारियों ने आचार्य विराग सागर जी महाराज जी के चित्र अनावरण और मुनि श्री का पाद प्रक्षालन कर किया।

कार्यक्रम में यह समाजजन मौजूद रहे

इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन ,रमेश जैन, प्रवीन जैन (पद्मावती ज्वैलर्स), शैलेश जैन, मुकेश जैन,विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, सचिन जैन, आशु जैन (वी.के), आशु बाबा, अनिकेत जैन, रोहित जैन, नितिन जैन,सतेंद्र जैन, सोनू), देवेंद्र जैन, मुरारी लाल जैन, दीपक जैन, गौरव जैन, मुन्ना लाल जैन, मीडिया प्रभारी राहुल जैन समस्त मंडल एवं सकल जैन समाजजन मौजूद थे।