इंदौर। नेमिनगर जैन कॉलोनी में जारी इंद्रपुरी चातुर्मास उत्सव में आचार्यश्री सुनीलसागर जी महाराज के नित्य प्रवचनों से सन्मति समवशरण में उपस्थित गुरु भक्त, श्रावक-श्राविकाओं और श्रद्धालुओं को धर्म और आध्यात्म का ज्ञान का लाभ अर्जित हो रहा है। शनिवार को धर्मसभा में आचार्य भगवन ने कहा कि जैन दर्शन में भावों का विशेष महत्व बताया गया है। जब तक मन में विकार, राग-द्वेष और कषाय के भाव बने रहते हैं, तब तक कर्मों का आश्रव होता रहता है और संसार का बंधन बना रहता है। इसलिए यदि मनुष्य अपने भावों को निर्मल कर ले तो आत्मा को शुद्धि और मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग मिलता है।
जिसके भाव उजले होते हैं, उसके चेहरे पर उज्जवलता
अकंपनाचार्य मुनिराज की रक्षा का पवित्र भाव बनाकर विष्णुकुमार मुनिराज ने भावों की शक्ति का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके भीतर जागा वात्सल्य और समर्पण का भाव ही उनके जीवन की महानता का कारण बना। यही संदेश देता है कि भाव केवल मन की अनुभूति नहीं, बल्कि आत्मा की दिशा तय करने वाली शक्ति हैं। कहा भी गया है कि जिसके भाव उजले होते हैं, उसके चेहरे और व्यक्तित्व पर भी उज्ज्वलता दिखाई देती है। वहीं जिनके भाव क्रोध, ईर्ष्या, छल और कषाय से कलुषित होते हैं, उनके चेहरे पर बाहरी सुंदरता के बावजूद एक प्रकार की मलीनता दिखाई देने लगती है। इसलिए सच्चा निखार चेहरे का नहीं, भावों का होना चाहिए क्योंकि, जब भाव निर्मल होंगे, तभी कर्मों का आश्रव रुकेगा और आत्मा संसार से पार होने की दिशा में आगे बढ़ेगी।



