धरियावद। भक्तामर विधान के 28वें दिन शनिवार को सोलह पुण्यार्जक परिवारों ने सपरिवार विधान में बैठकर भक्तामर संगीत के साथ भक्ति-भावपूर्वक आराधना की तथा मंडप पर 48 अर्घ्य समर्पित किए। इस अवसर पर आयोजित प्रवचन माला में आचार्य कल्पपुण्यसागर जी महाराज ने कहा कि भाद्रपद मास का प्रारंभ हो गया है। इस मास में अनेक धार्मिक पर्व मनाए जाते हैं। पर्व हमारे जीवन को सावधान करने और संयम की ओर प्रेरित करने आते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य कब तक असंयमित जीवन जीता रहेगा? पर्व हमें आत्मचिंतन का अवसर देते हैं और अनेक व्यक्ति इन अवसरों पर व्रत एवं संयम धारण कर अपने जीवन में संयम की वृद्धि करते हैं।
व्यक्ति जीवन को तीर्थंकर पद की दिशा में अग्रसर कर सकता है
आचार्यश्री ने कहा कि व्रत और तप ही संयम को मजबूत बनाते हैं। जिस प्रकार सोने को तपाने पर उसकी अशुद्धियां दूर होकर वह शुद्ध होता है, उसी प्रकार तप और संयम से आत्मा का परिष्कार होता है। जैन धर्म में भाद्रपद मास की सोलहकारण भावना भी महत्वपूर्ण आराधना मानी गई है। श्रद्धा और विधिपूर्वक इसकी आराधना करने से व्यक्ति अपने जीवन को तीर्थंकर पद की दिशा में अग्रसर कर सकता है।
यही सम्यक दर्शन का भाव
उन्होंने कहा कि जीवन में अपने इष्ट के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास बनाए रखना चाहिए। यही सम्यक दर्शन का भाव है और सम्यक दर्शन अंततः मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सम्यक दर्शन, संयम और तप की भावना को दृढ़ बनाना चाहिए।




