सीकर। पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी नगर के पारस भवन दंग की नसिया में विराजित हैं।आचार्य श्री द्वारा प्रतिदिन धर्म उपदेश सरल भाषा में दिया जा रहा है। यह उपदेश केवल जैन धर्म के लिए नहीं होकर अपितु सर्वसाधारण के लाभार्थ होता है, जो उपदेश दिया जाता है उसका सभी धर्म के व्यक्ति पालन करें तो उनके जीवन में उन्नति हो सकती है। 16 कारण पर्व के तहत चल रही प्रवचन माला में राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आचार्य श्री धर्म सागर सभागृह में विनय संपन्नता भावना के ऊपर विस्तृत व्याख्या में बताया कि विनय मोक्ष का द्वार है। विनय से कर्मों का नाश होता है। विनीत व्यक्ति मोक्ष का राही है,सम्यक दर्शन, ज्ञान , चारित्र ,देव ,शास्त्र, गुरु की विनय करना चाहिए। बिना विनय के ज्ञान नहीं मिलता। विनय पूर्वक तप करने से कर्मों की निर्जरा होती है। ज्ञानी के ज्ञान के साधनों की विनय करना चाहिए। गुरु के उपदेश, स्वाध्याय, सामायिक, धार्मिक क्रियाओं के समय जोर-जोर से चर्चा, मोबाइल से बच्चों के शोरगुल खेलने से बाधा विध्न विनय से अभाव से कर्म बंध होता है। कर्म बंधन ही संसार परिभ्रमण और दुख कष्ट का कारण है।

स्वाध्याय वैराग्य का आधार है

डॉ. राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि आज रविवार होने से छोटे-छोटे बालक बालिका भी धर्मसभा में उपस्थित हैं। धार्मिक ज्ञान या लौकिक ज्ञान विद्या विनय से आती है। सभी को ज्ञान प्राप्ति के साधन जैसे विद्यालय ,गुरुजन शिक्षक पुस्तक , ग्रंथ के प्रति विनयवान श्रद्धावान होना चाहिए,विनय में सत्कार , आदर श्रद्धा समर्पण भक्ति का भाव रहना चाहिए। धार्मिक स्वाध्याय ,अच्छे, बुरे, हित अहित का ज्ञान करता हैं, स्वाध्याय वैराग्य का आधार है। जैसे लौकिक व्यापार व्यवसाय में आप ग्राहक के प्रति विनय रखते हैं वैसी विनय देव शास्त्र गुरु माता-पिता की करना चाहिए।

विनय से अवगुणों को गुणों में परिवर्तित करना चाहिए

लौकिक जीवन में गुरुजनों, माता-पिता के प्रतिदिन चरण स्पर्श करना चाहिए गुरुजनों के उपदेश श्रवण कर जीवन में अपना कर गलतियां दोष दूर करना चाहिए। विनय आत्मा से करना चाहिए विनय में दिखावा नहीं होना चाहिए देव शास्त्र गुरु हमारे आराध्य हैं उनकी विनय में ही जीवन की सार्थकता है। विनय से अवगुणों को गुणों में परिवर्तित करना चाहिए।

नेत्रहीन शिष्य की नेत्र ज्योति वापस आ गई

आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री चिंतन सागर जी ने अपने चिंतन में अनेक धार्मिक ग्रंथ सर्वार्थसिद्धि ग्रंथ, मूलाचार ,तत्त्वार्थसूत्र आदि की गाथा के माध्यम से बताया कि गुरु की सेवा निश्चल ,अहंकार रहित ,निस्वार्थ भाव विनय भक्ति समर्पण से करना चाहिए। प्राचीन आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी ने नेत्रहीन शिष्य को जब मस्तक पर और नेत्रों पर आशीर्वाद दिया तो नेत्रहीन शिष्य की नेत्र ज्योति वापस आ गई।

विनय संपन्नता से तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध

सीकर में साक्षात विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की दीक्षा के चार माह बाद सन 1969 में नेत्र ज्योति जयपुर खनिया जी में चली गई थी, जो शांति भक्ति के लगातार पाठ करने से उनके नेत्र ज्योति वापस आ गई। विनय चार प्रकार की होती है ज्ञान, दर्शन, चरित्र और उपचार नवदेवता की श्रद्धा ,पूजा,भक्ति ,विनय से करना चाहिए सम्यक दर्शन के आठ अंगों का पालन करना चाहिए। सन 1987 में सीकर प्रवास का उल्लेख कर बताया कि आचार्य श्री धर्म सागर जी के अघोषित संलेखना समाधि चल रही थी तो आचार्य श्री मुनि अवस्था में गुरु के आहार होने के बाद ही स्वयं दोपहर में आहार करते थे। विनय श्रद्धा भक्ति से उनकी सेवा करते थे। विनय संपन्नता से तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध होता है।