मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को अपनी अमृतमयी वाणी से संबोधित करते हुए आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने जीवन के परम रहस्य को समझाने के लिए सम्राट और संत का प्रेरक प्रसंग सुनाया। आचार्यश्री ने बताया कि एक सम्राट जीवन का परम रहस्य जानना चाहता था। अनेक प्रयासों के बाद एक संत उसके दरबार में पहुंचे। सम्राट ने उनसे ऐसा सूत्र बताने का आग्रह किया, जो सुख-दुःख और संकट की प्रत्येक परिस्थिति में उसका मार्गदर्शन कर सके। संत ने उसे एक ताबीज देते हुए कहा कि इसे सामान्य परिस्थितियों में नहीं खोलना। जब जीवन में ऐसा संकट आए, जब बचने का कोई मार्ग दिखाई न दे, तभी इसे खोलना।
सम्राट के भीतर धैर्य और साहस जगा दिया
कुछ समय बाद पड़ोसी राजा ने सम्राट पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में सम्राट को जान बचाकर भागना पड़ा। नदी के किनारे पहुंचकर जब उसे लगा कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, तब उसे संत का दिया हुआ ताबीज याद आया। ताबीज खोलने पर उसमें एक कागज मिला, जिस पर लिखा था- यह भी बीत जाएगा। आचार्यश्री ने कहा कि इस एक वाक्य ने सम्राट के भीतर धैर्य और साहस जगा दिया। उसे समझ आया कि कोई भी परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। समय बदलता है और परिस्थितियां भी बदल जाती हैं।
धैर्य, समता और धर्म का सहारा लेना चाहिए
उन्होंने कहा कि जीवन में आज जो है, वह हमेशा नहीं रहेगा और जो आज नहीं है, वह भविष्य में आ सकता है। इसलिए सुख में अहंकार और दुःख में निराशा नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक परिस्थिति में धैर्य, समता और धर्म का सहारा लेना चाहिए। दूसरों के पुण्य कार्यों की अनुमोदना करते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव को समभाव से स्वीकार करना ही सच्चे धर्म की पहचान है। जीवन का सत्य यही है- यह भी बीत जाएगा।
दूसरों के पुण्य कार्य की अनुमोदना भी पुण्य का कारण
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने आहारदान की भावना और अनुमोदना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि कोई श्रद्धालु यह भावना रखता है कि मुझे अंजुली में आहार करने का सौभाग्य प्राप्त हो, ऐसा आशीर्वाद दीजिए तो उसकी भावना की हृदय से अनुमोदना करनी चाहिए। साधु-संतों के प्रति श्रद्धा रखना तथा धर्म कार्य करने वालों की अनुमोदना करना भी पुण्य का कारण बनता है। उन्होंने राजा वज्रजंघ और उनकी पत्नी का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि वे दण्डक वन पहुंचे, जहां उन्होंने चारण ऋद्धिधारी मुनिराजों को श्रद्धापूर्वक आहारदान दिया। वन में मौजूद कुछ तिर्यंच प्राणियों ने इस धार्मिक कार्य को देखा और प्रसन्न होकर मन से उसकी अनुमोदना की।
पुण्य कार्य की निर्मल भाव से अनुमोदना अवश्य करें
मुनिश्री ने कहा कि उन जीवों ने स्वयं आहारदान नहीं किया, लेकिन निर्मल भाव से धर्मकार्य की अनुमोदना की। अनुमोदना के पुण्य से उनका कल्याण हुआ और उन्हें श्रेष्ठ गति प्राप्त हुई। इससे स्पष्ट है कि यदि स्वयं पुण्य कार्य करने का अवसर न मिले तो दूसरों के पुण्य कार्य की निर्मल भाव से अनुमोदना अवश्य करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी को मंदिर जाते, पूजा करते, तपस्या करते अथवा साधु-संतों को आहारदान करते देखकर मन में प्रसन्नता का भाव उत्पन्न होना ही सच्ची अनुमोदना है। धर्म के मार्ग पर दूसरों के पुण्य कार्य में प्रसन्न होना भी आत्मकल्याण का महत्वपूर्ण साधन है।





