अडिंदा। आर्यिका सुभूषणमति माताजी ने कहा कि जब बालिकाओ़ं का गर्भपात हो, विवाह के पावन बंधन से कतराएं और विवाह की उम्र 30 के पार हो, संतान उत्पत्ति के पावन धर्म से दूरी तथा ’हम दो हमारा एक’ ’शेर का बच्चा एक ही अच्छा’ जैसे नारे दिल में बैठे हो तब रिश्तों का क्या हश्र होगा? यह प्रबोधन आर्यिका श्री सुभूषण माताजी ने वात्सल्य पूर्णिमा (रक्षाबंधन) पर श्री 1008 तीर्थंकर श्री श्रेयांस नाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक महोत्सव के दौरान दिए। आर्यिका श्री सुभूषण मति माताजी 1500 वर्ष प्राचीन अतिशयकारी श्री अडिंदा पार्श्वनाथ के पाद मूल में 42 वें अभिनंदनीय वर्षायोग हेतु ससंघ विराजमान हैं। आर्यिका श्री सुभूषण मति माताजी’ के श्रीमुख से मंत्रों के साथ मूलनायक भगवान श्री पार्श्वनाथ का विभिन्न फलों के रसों से पंचामृत अभिषेक, शांतिधारा सभी श्रावक-श्राविकाओं ने किया। संघस्थ चैत्यालय में भी कल्पद्रुम भगवान श्री शांतिनाथ जी के पंचामृत अभिषेक के बाद निर्वाण लाडू अर्पण किया गया। पंचामृत अभिषेक के बाद पूज्य गणिनी श्री की प्रेरणा से अनेक श्रावकों ने यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण की। इसके बाद श्री गणिनी गुरु मां का पंचामृत द्रव्यों से पाद प्रक्षालन भी गुरु भक्तों ने किया गया।
वात्सल्य प्राणिमात्र से होता है, निःस्वार्थ होता है
धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणिनी श्री ने कहा कि आज का पर्व है वात्सल्य पूर्णिमा। याद रखना प्रेम एक छोटा सा दरिया है, लेकिन वात्सल्य महासागर है। प्रेम स्नेही जन से होता है। प्रेम में रिटर्न की अपेक्षा रहती है, परन्तु वात्सल्य प्राणिमात्र से होता है, निःस्वार्थ होता है, रिटर्न की कोई अपेक्षा नहीं। विष्णु कुमार मुनि ने जैनत्व व जैन साधुओं की रक्षा करने के लिए कितना बलिदान किया, परन्तु वर्तमान में आप साधु-संतों से दूर होते जा रहे हैं। साधर्मी आपको सुहाते नहीं। परिवार में भी ’हम दो, हमारा एक’” का अनुसरण करते हैं। याद रखना-पंचमकाल के अंत तक सम्यक दृष्टि मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका रहेंगे। साधु सानिध्य करोगे तभी श्रावकाचार समझ में आएगा। इसलिए आज साधुओं की सेवा करने का संकल्प करें। जिन शासन के प्रति समर्पित रहें और सा धर्मियों के साथ मिलकर रहें।
जनेऊ के बिना श्रावक को जिन बिंब छूने का अधिकार नही
आर्यिका श्री ने कहा कि एक बात और ध्यान रखना-700 मुनियों के उपसर्ग को सूतक के समान मानकर उपसर्ग निवारण होने पर सभी श्रावकों ने उपनयन (यज्ञोपवीत) परिवर्तन किया। गणिनी श्री ने अपनी आगमिक वाणी में ‘उपनयन की महिमा’ बताते हुए कहा कि-आगम के अनुसार जनेऊ के बिना श्रावक को जिन बिंब छूने का अधिकार नहीं। भगवान आदिनाथ ने अपने हाथों से भरत और बाहुबली को जनेऊ पहनाई और बाहुबली ने तो मोतियों की जनेऊ धारण की। आचार्य कहते हैं कि-यदि श्रद्धा से जनेऊ धारण की है तो उसे कभी भूत-प्रेत-बाधा नहीं सताती। आगम के अनुसार 8 वर्ष की आयु में उपनयन संस्कार कर बालक को श्रावक बनाया जाता है। वास्तव में श्रावक का वही सच्चा जन्म होता है, अर्थात् उपनयन संस्कार के बाद ही वह श्रावक कहलाता है।
गुरु मां ने आगे बताया यदि वर्तमान हालात नहीं बदले तो जैनियों की जनसंख्या समाप्त हो जाएगी। बनने वाले जिनालयों और साधुओं की रक्षा कौन करेगा।
गुरु मां के जय घोष से दिशाएं गुंजायमान की
सच्चा और अच्छा वात्सल्य पर्व, सिर्फ सूत्र हाथ में बांधने से नहीं बनेगा। हमें धर्म के प्रति समर्पण का सुत्र मन में धारण करना होगा। क्षेत्र पर उपस्थित श्रावक श्राविकाओं ने भक्ति भाव से गुरु मां के जय घोष से दिशाएं गुंजायमान कर दी। मन में धर्म की रक्षा का संकल्प कर गुरु चरणों में ’वन्दामी वन्दामी वन्दामी’ निवेदित करते हुए निज धाम को प्रस्थित हुए। यह जानकारी अंजलि जैन खतौली मुजफ्फरनगर उप्र ने दी।




