धरियावद। भक्तामर विधान के 30वें दिन नौ पुण्यार्जक परिवारों ने विधान में बैठकर श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक पूजा-अर्चना की तथा मंडप पर 48 अर्घ्य समर्पित किए। इस अवसर पर प्रवचन श्रृंखला में आचार्य कल्प पुण्य सागर जी महाराज ने सोलह भावनाओं के अंतर्गत विनय संपन्नता भावना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज मानव के जीवन में भौतिक रूप से अनेक प्रकार की संपन्नता है, लेकिन विनय का अभाव दिखाई देता है। जब तक जीवन में विनय नहीं होगा, तब तक वास्तविक संपन्नता का कोई अर्थ नहीं है।

झुका हुआ वृक्ष अपनी रक्षा कर लेता है

आचार्यश्री ने कहा कि विनयवान व्यक्ति किसी का अनादर नहीं करता और सदैव गुणों का सम्मान करता है। इसके विपरीत अहंकार मनुष्य को झुकने नहीं देता। जिस प्रकार तेज हवा और तूफान में सीधा खड़ा वृक्ष टूट सकता है, लेकिन झुका हुआ वृक्ष अपनी रक्षा कर लेता है, उसी प्रकार जीवन में विनय मनुष्य को अनेक विपरीत परिस्थितियों से बचाता है।

सच्ची विनय वह है जिसमें स्वार्थ नहीं

आचार्य श्री ने कहा कि भौतिकता के इस युग में मनुष्य झुकना भूलता जा रहा है। विनय ज्ञान का प्रदाता है और मोक्ष मार्ग में भी विनय का विशेष महत्व है। आज चुनावी मौसम में भी व्यक्ति लोगों के सामने झुककर विनय प्रकट करता है, लेकिन सच्ची विनय वह है जो स्वार्थ से नहीं, बल्कि संस्कार और सद्भाव से उत्पन्न हो।

मनुष्य जीवन रूपी दुर्लभ अवसर को विनयमय बनाएं

आचार्यश्री ने विनय के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में दर्शन विनय, ज्ञान विनय, चारित्र विनय तथा उपचार विनय को धारण करना चाहिए। मनुष्य जीवन रूपी दुर्लभ अवसर को विनयमय बनाकर व्यक्ति लौकिक संपदा के साथ-साथ स्वर्ग संपदा और अंततः मोक्ष संपदा को भी प्राप्त कर सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि अहंकार को त्यागकर अपने जीवन में विनय को धारण करें, क्योंकि विनय ही मनुष्य को वास्तविक रूप से महान बनाता है।