इंदौर। कंचनबाग स्थित दिगंबर जैन समवशरण मंदिर परिसर में शनिवार को दशलक्षण पर्व के अवसर पर चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर आर्यिका सुदृढ़मति माताजी के प्रवचन हुए। उन्होंने उत्तम शौच धर्म की व्याख्या करते हुए आत्मा की शुद्धि, मन काय वचन की शुद्धता के साथ संयम रखने पर विशेष जोर दिया। समवशरण मंदिर में नित्य पूजन, अर्घ्य आदि के कार्यक्रम आर्यिका सुदृढ़ मति माताजी और आर्यिका सुलेखमति माताजी के सानिध्य में श्रावक-श्राविकाओं ने किए। शनिवार को प्रवचन में उन्होंने कहा कि आप हर रोज जो हर तरीके से जो-जो कार्य हम करते हैं। उसमें आज पूरे दिन में 5-10 मिनट निकलना लिटरेरी उसको लिखना और उसकी सीमा इससे ज्यादा नहीं होनी चाहिए। और भगवान के सामने बैठकर लिस्ट तैयार करना फिर उसको 9 बार णमोकार मंत्र से जीवन भर के लिए संकल्प ले लेना। माताजी ने कहा कि बस दृष्टि बदलनी चाहिए। प्रायोरिटी चेंज होनी चाहिए। प्रायोरिटी चेंज होती है तो सिर्फ यह सब चीज बहुत आसान हो जाती है। समय वही है ऊर्जा वही है, अब उसको किसमें लगाना है। इस पर विचार करना चाहिए।

ज्ञान को इंद्रियतीत आनंद को पाने में लगाना है

उन्होंने कहा कि इस अंधी दौड़ में सिर्फ यह पाना, वह पाना और पाना या फिर अपने लिए किसी को भी क्या चाहिए। हेल्थ वेल्थ हैप्पीनेस। दृष्टि है कि हेल्थ मतलब हमेशा की तरह शरीर निरोगी रहे। जो खुद बीमारियों का घर है वह तन हमेशा स्वस्थ रहना चाहिए। इच्छा रखें बेस्ट हेल्थ हो। माताजी ने देशना देते हुए कहा कि आपका जब मरण होता है तो आपके घर वाले शरीर पर एक अंगूठी तक नहीं छोड़ते आपके शरीर में। आप सोचो मैं इतना सोना पहन के मर जाऊं? आपको जलाने जाएंगे तो सब उतार लेंगे। फिर इतना संचय क्यों करना शौक के चक्कर में, टेंशन के चक्कर में और है इंद्रीय आदमी हो परम आनंद चाहिए पर अब यह दृष्टि उस दिन उसे इंद्रिय चेतन, उसे ज्ञान को इंद्रियतीत आनंद को पाने में लगाना है।

पंडित सुखदास जी के प्रसंग से आत्म संतुष्टी का दिया संदेश

पंडित सुखदास जी का प्रसंग सुनाते हुए माताजी ने कहा कि वे का चार्ट लिखने वाले थे। आप जैसे श्रावक थे। खजांची जैसा काम करते थे। जयपुर में एक सेठ के दरबार में सर्विस करते थे और हर महीने पेमेंट मिलती थी। अपना काम करते थे। अपना स्वाध्याय भी करते थे। बहुत पुरानी बात है। एक दिन सेठ जी ने उनकी सैलेरी बढ़ा दी। दो रुपए ज्यादा दिए। पंडित सुखदास ने कहा कि मेरा पेमेंट इतना नहीं है। सैलरी इतनी नहीं है। सेठ जी ने कहा कि आप बहुत वर्षों से कम कर रहे हैं। अच्छा काम कर रहे तो आपकी सैलरी इस महीने से बढ़ा दी गई है। उन्होंने उसे लेने से मना कर दिया। सेठ जी तक बात पहुंची और उनको लगा कि शायद बुरा मान गए हैं। सेठ जी ने कहा कि हमारे मन में कब से था कि आपको देना ही है और ऐसा लगे तो पिछले वर्षों का भी इस हिसाब से हम आपको सैलरी दे देते हैं। उन्होंने कहा कि आप मुझे देना ही चाहते हैं तो बस इतना कर दो कि कम से कम दो घंटे फ्री कर दो। ताकि मैं इतनी देर स्वाध्याय कर सकूं।

अपना समय और ऊर्जा कहां पर देना है इस पर विचार करें

अधिक धन के लालच में लोग देश से दूर चले जाते हैं। धर्म से दूर चले जाते हैं कि बड़ा पैकेज मिल रहा है। अब कॉलोनी से बाहर जाएंगे। बाहर की तरफ तो बड़ा घर मिल जाएगा। मंदिर दूर होगा तो दूर दर्शन दूर होगा। माताजी ने कहा कि हर व्यक्ति को जितनी अपनी आवश्यकता है उसको पहचानना चाहिए और अपना समय और ऊर्जा कहां पर देना है। इस पर विचार करना चाहिए। इस अवसर पर हसमुख गांधी, एमके जैन एलआईसी, अजीत जैन सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहीं।