धर्मसभा। दशलक्षण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म की धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि कोमलता, निर्मलता और विनय ही उत्तम मार्दव धर्म का स्वरूप है। नम्रता और सरलता को जीवन का अमृत बताते हुए उन्होंने कहा कि जो जितना झुकता है, वह उतना ही ऊंचा उठता है।

कोमलता जीवन को देती है आकार

आचार्य श्री ने मार्दव धर्म को कोमलता का सूचक बताते हुए कहा कि जिस प्रकार नर्म मिट्टी को कुंभकार अपनी इच्छा के अनुसार आकार देता है, उसी प्रकार मनुष्य भी जीवन में सरलता और कोमलता अपनाकर अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठ आकार दे सकता है। कृषक भी फसल लेने के बाद खेत को धूप में तपाकर और हल चलाकर मिट्टी को नर्म करता है, तभी वह अगली फसल के लिए तैयार होती है।

मान भीतर से करता है कमजोर

आचार्य श्री ने कहा कि क्रोध और मान जीवन में विकृति उत्पन्न करते हैं। मान ऐसी मीठी कषाय है, जिसके कारण व्यक्ति भीतर ही भीतर झुलसता रहता है। उन्होंने कहा कि मान को छोड़कर नम्रता, सरलता और विनय को जीवन में स्थान देना आवश्यक है। विनय का गुण मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है।

विनय के बिना शिक्षा अधूरी

धर्मसभा में आचार्य श्री ने कहा कि विनय के अभाव में संपूर्ण शिक्षा निरर्थक हो जाती है। विनय के बिना सम्यक दर्शन भी स्थिर नहीं रह सकता। उन्होंने समझाया कि कुएं से पानी निकालते समय बाल्टी को झुकाना पड़ता है, तभी वह पानी से भरती है। इसी प्रकार जीवन में नम्रता आवश्यक है।

आठ प्रकार के मद से बचने का संदेश

आचार्य श्री ने कुल, रूप, जाति, बुद्धि, तप, श्रुत और शील आदि से संबंधित मद का उल्लेख करते हुए कहा कि जो व्यक्ति इन विषयों में किंचित मात्र भी गर्व नहीं करता, उसके भीतर मार्दव धर्म प्रकट होता है। ऐसा व्यक्ति मार्दव धर्म का धारी कहलाता है।

लघुता से मिलती है प्रभुता

आचार्य श्री ने कहा कि बड़प्पन लघुता से मिलता है और लघुता से प्रभुता प्राप्त होती है। उन्होंने अभिमान और स्वाभिमान में अंतर बताते हुए कहा कि स्वाभिमान आत्मा, धर्म और जैन कुल के प्रति होना चाहिए, जबकि अहंकार आत्मा के गुणों को ढक देता है। मार्दव भाव आत्मा का गुण और मोक्ष सुख का कारण है।

संघ और पर्व हैं आत्मचिकित्सालय

आचार्य श्री ने कहा कि संघ और धार्मिक पर्व आत्मा की चिकित्सा करने वाले चिकित्सालय के समान हैं, जो धर्म के माध्यम से आत्मा की विकृतियों को दूर करने में सहायक बनते हैं। मार्दव धर्म अहंकार का नाश करता है और आत्मा को निर्मलता की ओर ले जाता है।

मुनि श्री प्रभव सागर जी ने भी दिया उपदेश

आचार्य श्री के प्रवचन से पूर्व मुनि श्री प्रभव सागर जी ने कहा कि दशलक्षण धर्म मुनियों और श्रावकों दोनों के लिए हैं। सभी को अपनी सामर्थ्य के अनुसार इन धर्मों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।

पंचामृत अभिषेक और शांतिधारा

इसके पूर्व आचार्य श्री के सान्निध्य में विधानाचार्य कीर्तिय जी के निर्देशन में श्रीजी का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा पुण्यार्जक परिवार द्वारा की गई। संघ की आहारचर्या के बाद दोपहर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने तत्वार्थ सूत्र की विवेचना की।

तप और आराधना में जुटे श्रद्धालु

दशलक्षण पर्व के अवसर पर अनेक साधुओं के साथ श्रावक-श्राविकाएं उपवास, व्रत और विभिन्न धार्मिक आराधनाएं कर कर्मों की निर्जरा में जुटे हैं। शाम को श्रीजी एवं आचार्य श्री की आरती के बाद स्थानीय महिला मंडल द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए।

आचार्य श्री का जन्म जयंती महोत्सव

भादव शुक्ल सप्तमी के अवसर पर पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 77वां जन्म जयंती महोत्सव मनाने का अवसर समाज को प्राप्त हो रहा है। इस अवसर पर पुण्यशाली परिवार द्वारा चरण प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेंट की जाएगी।

देशभर से पहुंचेंगे श्रद्धालु

जन्म जयंती महोत्सव के अवसर पर विभिन्न द्रव्यों, फल-फूल, नैवेद्य, सूखे मेवे और श्रीफल आदि से आचार्य श्री की संगीतमय पूजन की जाएगी। आयोजन में देश के अनेक नगरों से भक्तों के पहुंचने की संभावना है।

विनय ही मोक्षमार्ग की आधारभूमि

आचार्य श्री ने अपने धर्म संदेश में कहा कि मान विष के समान है, जबकि नम्रता, सरलता और विनय अमृत के समान सुख प्रदान करते हैं। जीवन में अहंकार का त्याग कर मार्दव भाव धारण करना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।