मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि संसार में देवत्व की अनेक कल्पनाएं की जाती हैं, लेकिन जो वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं, वही वास्तविक सच्चे देव हैं। सच्चे देव की पहचान केवल बाहरी चमत्कारों या सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि उनके वीतराग स्वरूप, सर्वज्ञता और उनके द्वारा बताए गए मोक्षमार्ग से होती है। आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे देव की पहचान के साथ सच्चे आगम की पहचान करना भी उतना ही आवश्यक है। संसार में अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं और अनेक प्रकार के उपदेश दिए जाते हैं, लेकिन प्रत्येक पुस्तक या कथन शास्त्र नहीं होता। सच्चा शास्त्र वही है जो सच्चे आप्त द्वारा प्रतिपादित हो, वादी-प्रतिवादी के विरोध से रहित हो तथा प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों के अविरोधी हो। आगम का उद्देश्य मनुष्य को भ्रमित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सत्य का प्रकाश करना है।

सच्चा शास्त्र मिथ्यामार्ग का खंडन करता है

आचार्यश्री ने कहा कि सच्चा आगम जीव और अजीव सहित समस्त तत्त्वों का यथार्थ स्वरूप बताता है। वह जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराकर संसार के बंधन, कर्मों के आस्रव और बंधन के कारणों को समझाता है तथा उनसे निवृत्ति और मोक्ष की दिशा में बढ़ने का मार्ग दिखाता है। सच्चा शास्त्र मिथ्यामार्ग का खंडन करता है और जीव को सम्यक् मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

ज्ञान सच्चे आगम से प्राप्त होता है

आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे देव मार्ग को प्रकाशित करते हैं और सच्चा आगम उस मार्ग का स्वरूप समझाता है। केवल देव की पूजा कर लेने या शास्त्र का पाठ कर लेने से आत्मकल्याण नहीं हो जाता, बल्कि श्रद्धा, ज्ञान और आचरणकृतीनों का समन्वय आवश्यक है। यदि श्रद्धा सच्चे देव में है और ज्ञान सच्चे आगम से प्राप्त होता है तो जीवन में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की दिशा प्रशस्त होती है। इसलिए आत्मकल्याण के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे देव और सच्चे शास्त्र की पहचान कर उनके बताए मार्ग पर चलने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

सच्चे शास्त्र का उद्देश्य आत्मा को जगाना है

धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि शास्त्र केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए होते हैं। शास्त्र हमें संसार की बाहरी वस्तुओं का ज्ञान कराने से अधिक स्वयं के स्वरूप का ज्ञान कराते हैं। जिस ज्ञान से आत्मा की पहचान हो और जीवन की दिशा बदले, वही ज्ञान सार्थक है। उन्होंने कहा कि हम शास्त्रों का पाठ तो करते हैं, लेकिन यदि हमारे भीतर राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और अहंकार कम नहीं हो रहे हैं, तो हमें विचार करना चाहिए कि हमने शास्त्र को केवल पढ़ा है या वास्तव में समझा भी है। सच्चे आगम का प्रभाव तभी माना जाएगा, जब उसके अध्ययन से हमारे विचारों में निर्मलता, व्यवहार में विनम्रता और जीवन में संयम बढ़े।

मुनिश्री ने कहा कि सच्चे देव पर श्रद्धा, सच्चे आगम का ज्ञान और उसके अनुसार जीवन जीने का पुरुषार्थ-यही आत्मकल्याण की सच्ची यात्रा है। शास्त्र हमें बाहर देखने के साथ-साथ अपने भीतर झांकने की कला सिखाता है। इसलिए आगम को केवल पुस्तक तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाएं।

सांध्यकालीन धर्मसभा में हुआ प्रश्न मंच

जैन विद्वत नवनीत जैन शास्त्री ने धर्मसभा का संचालन करते हुए आचार्यश्री एवं मुनिश्री के प्रवचनों के प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि धर्म को समझने के लिए जिज्ञासा आवश्यक है और प्रश्नों के माध्यम से ज्ञान को सरल एवं रुचिकर ढंग से आत्मसात किया जा सकता है। सांध्यकालीन धर्मसभा में गुरुभक्ति एवं महाआरती का आयोजन किया गया। प्रश्न मंच के माध्यम से बच्चों एवं युवाओं को जैन धर्म, भगवान एवं आगम से संबंधित प्रश्न पूछकर ज्ञानार्जन कराया गया। प्रश्नों के सही एवं सर्वाेत्तम जवाब देने वाले बच्चों एवं बड़ों को आकर्षक पुरस्कार प्रदान कर उनका उत्साहवर्धन किया गया। धर्मसभा में सैकड़ों की संख्या में सधर्मी बंधु, माता-बहनें एवं युवा साथियों ने सहभागिता कर प्रवचन, गुरुभक्ति एवं महाआरती का धर्मलाभ प्राप्त किया।