इंदौर। नेमिनगर जैन कॉलोनी में वर्षायोग के तहत चल रही धर्मसभा में आचार्य श्री सुनीलसागरजी गुरुदेव ने कहा धर्मस्थलों पर श्रद्धा से शीश झुकाना तभी सार्थक है, जब जीवन के व्यवहार में भी धर्म दिखाई दे। प्रवचन के दौरान कहा गया कि लोग मंदिर में पाप करने से, मस्जिद में गलत कार्य करने से, गुरुद्वारे में किसी को कष्ट देने से और चर्च में किसी को गाली देने से बचते हैं, लेकिन धर्मस्थल से बाहर निकलते ही अपने कर्मों के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। यह मनुष्य की बड़ी भूल है।
प्रभु केवल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च में ही हैं—यह हमारी सोच की सीमा है। ईश्वर का ज्ञान और कर्मों का सिद्धांत उस स्थान तक भी पहुंचता है, जहां मनुष्य स्वयं को सबसे छिपा हुआ समझता है। कोई व्यक्ति छिपकर कोयला खाए तो उसका मुंह काला होना निश्चित है, उसी प्रकार किए गए कर्मों का फल भी भोगना ही पड़ता है।
धर्मस्थल वास्तव में हमें धर्म, संस्कार और सदाचार की शिक्षा देने वाली एक पाठशाला हैं। वहां से मिले ज्ञान की असली परीक्षा मंदिर की चौखट के भीतर नहीं, बल्कि जीवन के व्यवहार रूपी मैदान में बाहर निकलकर होती है। इसलिए केवल धर्मस्थलों में पूजा-अर्चना करना पर्याप्त नहीं, बल्कि अपने विचार, वाणी और व्यवहार को भी धर्ममय बनाना ही सच्ची धार्मिकता है।




