कुण्डलपुर(म.प्र.)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने वॉट इज लाइफ श्रृंखला के तहत लाइफ इज ए ड्रीम विषय पर जीवन के सपने, मोह की निद्रा, जाग्रति, अनुप्रेक्षा और सम्यक पुरुषार्थ का गहन विवेचन किया। मुनि श्री का यह संदेश युवाओं को आधुनिक लक्ष्य-निर्धारण के साथ जैन दर्शन के जीवनोपयोगी सूत्रों को जोड़ने की प्रेरणा देता है। मैं कौन हूं कर्मों का हिसाब, अनुप्रेक्षा और हल’ जैसे सूत्र जीवन के लक्ष्य को केवल उपलब्धि ही नहीं, बल्कि आत्म-विकास और सार्थकता के साथ जोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन को समझने का अर्थ संसार को झूठा मानना नहीं,बल्कि उसकी अनित्यता को पहचानना है। संसार का अपना अस्तित्व है,लेकिन सांसारिक सुख, संबंध, शरीर, धन, पद और परिस्थितियां स्थायी नहीं हैं। मुनि श्री ने कहा कि जीवन की वास्तविकता को एक पंक्ति में समझना हो तो कहा जा सकता है“आंख खुली, सपना गया; आंख लगी अपना गया। दो दिन का मेहमान तू, श्वास रुकी, जपना गया। रात में देखा गया सपना आंख खुलते ही समाप्त हो जाता है उसी प्रकार मोह और अज्ञान की नींद में मनुष्य चलते-फिरते हुए भी अनेक सपने देखता रहता है। जब ज्ञान की आंख खुलती है तो उसे अपनी वास्तविक स्थिति का बोध होता है।
मनुष्य मोहिनी कर्म के प्रभाव में सत्य और असत्य का विवेक खो देता है
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जय कुमार जलज ने बताया कि मुनिश्री ने जैन दर्शन में अनित्यता के चिंतन को समझाते हुए कहा कि सूर्य-चंद्रमा का उदय-अस्त,ऋतुओं का परिवर्तन,बहती नदी,घटती श्वास,ढलता यौवन और धूप में पिघलती ओस की बूंदकृये सभी जीवन की क्षणभंगुरता का संदेश देते हैं।संसार मायाजाल नहीं है, बल्कि संसार के भीतर मौजूद वैभव और परिस्थितियां परिवर्तनशील हैं। इन्हें स्थायी मानकर उनसे आसक्ति करना ही मोह का कारण बनता है। मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य मोहिनी कर्म के प्रभाव में सत्य और असत्य का विवेक खो देता है।वह शरीर को ही आत्मा मान बैठता है और घर, धन, वाहन, नौकरी, व्यवसाय तथा परिवार को अपना मानकर उनके प्रति आसक्ति बढ़ाता रहता है। कल्पनाएं कितनी भी सुंदर क्यों न हों, वे व्यक्ति को सुला सकती हैं, जगा नहीं सकतीं। वास्तविक जागरण तब होता है,जब व्यक्ति अपनी आत्मिक पहचान को समझता है।
अनुप्रेक्षा का अर्थ है वस्तु-व्यवस्था का यथार्थ चिंतन करना
उन्होंने स्वप्न के संदर्भ में कहा कि विज्ञान स्वप्न को अधूरी इच्छाओं, विचारों और अवचेतन मन में संचित संस्कारों का प्रतिबिंब मानता है, जबकि जैन दर्शन कर्म सिद्धांत के आधार पर स्वप्न की व्याख्या करता है। पुण्य कर्म के उदय से शुभ तथा पाप कर्म के उदय से अशुभ स्वप्न आने की बात जैन दर्शन में कही गई है। संस्कारवश आने वाले अनेक स्वप्न निष्फल भी होते हैं। तीर्थंकर भगवान की माताओं द्वारा देखे गए शुभ स्वप्नों को उन्होंने पूर्व भवों के पुण्य के निमित्त से जुड़ा बताया। मुनि श्री ने कहा कि अनुप्रेक्षा का अर्थ है वस्तु-व्यवस्था का यथार्थ चिंतन करना। अनुप्रेक्षा व्यक्ति को यह समझाती है कि उसकी भावना क्या है और कामना क्या है। जब यह अंतर स्पष्ट होता है तो व्यक्ति की ऊर्जा सही दिशा में लगने लगती है। दया, क्षमा, वात्सल्य, करुणा, निःस्वार्थ प्रेम, ज्ञान की खोज और मानवता की सेवा जैसे भाव जीवन में विकसित होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को बाहरी दुनिया को जीतने से पहले अपने मन को जीतना जरूरी है।
मूल प्रश्न और आध्यात्मिक सूत्र भी वहां अंकित करने चाहिए
मन ही समय-समय पर चेतावनी देता है कि गलत दिशा में किया गया प्रयास ऊर्जा को नष्ट कर सकता है। इसलिए जीवन के लक्ष्य तय करते समय केवल उपलब्धियों को नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक शक्ति और मानसिक स्थिरता को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसके लिए उन्होंने ‘अपरिग्रह’ को एक महत्वपूर्ण सूत्र बताया।मुनि श्री ने आधुनिक जीवन के ‘विजन बोर्ड’ को जैन दर्शन के आध्यात्मिक सूत्रों से जोड़ते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन का लक्ष्य तय करता है तो उसके विजन बोर्ड पर केवल धन, पद, सफलता और भौतिक उपलब्धियों की तस्वीरें नहीं होनी चाहिए। उसे अपने जीवन के मूल प्रश्न और आध्यात्मिक सूत्र भी वहां अंकित करने चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए आठ कर्मों के फल, बारह भावनाओं और तत्त्वार्थ सूत्र के प्रथम अध्याय के सातवें सूत्र को समझना आवश्यक है। इसी चिंतन के आधार पर आधुनिक विजन बोर्ड को नया स्वरूप देते हुए चार सूत्र लिखे जा सकते हैं-‘मैं कौन हूं?’, ‘कर्मों का हिसाब’, ‘अनुप्रेक्षा’ और ‘हल’ मुनि श्री ने कहा कि ‘मैं कौन हूं’ व्यक्ति को उसकी वास्तविक पहचान की ओर ले जाता है।
जीवन के सूत्र के रूप में अपनाने की आवश्यकता है
‘कर्मों का हिसाब’ उसे अपने कर्म और उनके परिणामों की जिम्मेदारी समझाता है। ‘अनुप्रेक्षा’ उसे स्थिरता और यथार्थ चिंतन प्रदान करती है तथा ‘हल’ उसे समस्या के समाधान की दिशा में ले जाता है। यदि इन सूत्रों को केवल दार्शनिक विचार न मानकर जीवन के व्यवहारिक सिद्धांत बना लिया जाए तो अनेक समस्याओं का समाधान इन्हीं के माध्यम से खोजा जा सकता है।उन्होंने कहा कि हमारे आचार्यों ने आध्यात्मिक चिंतन की गहराई में उतरकर अनुभव और ज्ञान के ऐसे मोती निकाले हैं, जिन्हें जीवन के सूत्र के रूप में अपनाने की आवश्यकता है। जब ये सिद्धांत विजन बोर्ड से निकलकर जीवन का हिस्सा बनते हैं तो लक्ष्य तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि तब व्यक्ति भ्रम के साथ नहीं, बल्कि सत्य के साथ आगे बढ़ता है।मुनि श्री ने कहा कि बंद आंखों के सपने हमेशा सच नहीं होते, लेकिन जाग्रत अवस्था में देखे गए लक्ष्य और उन्हें साकार करने का पुरुषार्थ जीवन को नई दिशा देता है। उन्होंने आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी महाराज के उस संकल्प का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कुण्डलपुर के बड़े बाबा को छोटे मंदिर से निकालकर भव्य मंदिर में बड़े सिंहासन पर विराजमान करने का सपना खुली आंखों से देखा और उसे साकार करने के लिए निरंतर पुरुषार्थ किया। आज उस संकल्प की परिणति समाज के सामने है।
श्रेष्ठ सपनों को मेक इट ट्रू के संकल्प के साथ साकार कीजिए
उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपने जीवन का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें, लेकिन उस लक्ष्य को सम्यक पुरुषार्थ, अनुप्रेक्षा, अपरिग्रह और आत्मबोध से जोड़ें। उन्होंने कहा कि सपने केवल देखने के लिए नहीं, जागकर जीने और पुरुषार्थ से साकार करने के लिए होते हैं। मोह की नींद में देखे गए सपनों से जागिए, सत्य को पहचानिए और अपने श्रेष्ठ सपनों को मेक इट ट्रू के संकल्प के साथ साकार कीजिए।





