मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने प्रवचन में प्रभावना अंग का महत्व समझाते हुए कहा कि मोक्षमार्ग की प्राप्ति के लिए जीवन में अंतरंग और बहिरंग दोनों प्रकार की शुद्धि आवश्यक है। मनुष्य के भीतर रत्नत्रय का प्रकाश और बाहर धर्ममय आचरण दिखाई देना चाहिए, तभी जीवन सार्थक बनता है।

आचार्यश्री ने कहा कि पुरुषार्थसिद्ध्युपाय में प्रभावना को अंतरंग एवं बहिरंग दोनों रूपों से महत्वपूर्ण बताया गया है। आत्मा की वास्तविक प्रभावना किसी बाहरी प्रदर्शन अथवा प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय के तेज से होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर ज्ञान, दर्शन और चारित्र का प्रकाश बढ़ाने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धर्म की प्रभावना के अनेक माध्यम हैं। दान, तप, जिनपूजा और विद्या के माध्यम से जिनशासन की महिमा जन-जन तक पहुंचाई जा सकती है। प्रभावना का उद्देश्य व्यक्तिगत यश अथवा प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने निर्मल आचरण, साधना और धर्ममय जीवन के माध्यम से दूसरों के भीतर भी धर्म के प्रति श्रद्धा जागृत करना है।

राजा श्रेयांस ने दान से आगे बढ़ाई धर्म परंपरा

दान की प्रभावना का महत्व बताते हुए आचार्यश्री ने राजा श्रेयांस का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि राजा श्रेयांस ने भगवान को आहारदान देकर दान-तीर्थ की महान परंपरा को आगे बढ़ाया। दान केवल वस्तु देने का नाम नहीं है। जब दान के माध्यम से त्याग, करुणा, परोपकार और धर्म की भावना समाज में जागृत होती है, तब वही दान जिनशासन की प्रभावना का माध्यम बन जाता है।

आचार्यश्री ने कहा कि सामर्थ्य के अनुसार किया गया सात्विक दान व्यक्ति के भीतर परिग्रह की भावना को कम करता है और समाज में सहयोग एवं वात्सल्य की भावना को मजबूत करता है

तप द्वारा धर्म प्रभावना का उदाहरण देते हुए आचार्यश्री ने वादिराज मुनिराज का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि वादिराज मुनिराज ने भगवान आदिनाथ की स्तुति में सहस्रनाम स्तोत्र की रचना कर अपनी तप-साधना एवं विद्वत्ता के माध्यम से जिनेन्द्र भगवान की महिमा को जन-जन तक पहुंचाया। आचार्यश्री ने कहा कि तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है। तप आत्मशुद्धि, कषायों के क्षय और कर्मनिर्जरा का प्रभावी साधन है। तपस्वी का संयमित, त्यागमय और निर्मल जीवन अपने आप में धर्म की प्रभावना बन जाता है। जब साधक का जीवन दूसरों को संयम और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है, तब उसकी साधना सार्थक होती है।

धनञ्जय कवि की जिनभक्ति ने दिखाई श्रद्धा की शक्ति

जिनपूजा से धर्म की प्रभावना समझाते हुए आचार्यश्री ने सेठ धनञ्जय कवि का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि धनञ्जय बहुत बड़े कवि एवं विद्वान थे। उन्होंने परिश्रमपूर्वक एक विशाल शब्दकोश तैयार किया, लेकिन किसी व्यक्ति ने उसे चुरा लिया। रचना चोरी हो जाने के बाद भी उन्होंने निराशा को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और उसी रात पुनः दूसरा शब्दकोश तैयार कर दिया। आचार्यश्री ने प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए बताया कि एक बार धनञ्जय कवि के पुत्र को सर्प ने डस लिया और उसके शरीर में विष फैल गया। पुत्र की ऐसी स्थिति देखकर भी धनञ्जय कवि ने अपनी जिनपूजा नहीं छोड़ी। उन्होंने भगवान की भक्ति करते हुए विषापहार स्तोत्र की रचना की और जल का छींटा पुत्र पर लगाया। प्रसंग के अनुसार बालक स्वस्थ हो गया।

विद्या के माध्यम से दूर करें अज्ञान का अंधकार

आचार्यश्री ने कहा कि विद्या का अतिशय भी धर्म की प्रभावना का महत्वपूर्ण माध्यम है। ज्ञान जब जिनवाणी से जुड़ता है और विद्वान अपनी वाणी एवं लेखनी के माध्यम से लोगों के अज्ञान को दूर करता है, तब ज्ञान स्वयं धर्म के प्रकाश का माध्यम बन जाता है। उन्होंने कहा कि विद्या का उद्देश्य केवल विद्वान कहलाना नहीं होना चाहिए। ज्ञान ऐसा हो, जो व्यक्ति को स्वयं के स्वरूप को समझने में सहायता दे और दूसरों के जीवन में भी सद्ज्ञान का प्रकाश पहुंचाए। जिनवाणी का अध्ययन, मनन और उसके संदेश को जन-जन तक पहुंचाना भी प्रभावना का श्रेष्ठ माध्यम है।

बहिरंग प्रदर्शन नहीं, अंतरंग शुद्धि है वास्तविक प्रभावना

आचार्यश्री ने कहा कि आज मनुष्य अनेक प्रकार से अपनी प्रसिद्धि चाहता है, लेकिन धर्म में प्रभावना का अर्थ प्रसिद्धि पाना नहीं है। वास्तविक प्रभावना तब होती है, जब हमारे आचरण को देखकर किसी दूसरे व्यक्ति के भीतर धर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो। उन्होंने कहा कि दान से त्याग की प्रेरणा मिले, तप से संयम जागे, जिनपूजा से भक्ति प्रकट हो और विद्या से अज्ञान का अंधकार दूर हो—ऐसा जीवन ही जिनशासन की सच्ची प्रभावना करता है। हमें अपने जीवन में यह देखना चाहिए कि हमारे कारण धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ रही है या केवल हमारा अहंकार।

मुनिश्री उपशांतसागर जी ने कहा—धर्म का प्रभाव आचरण से दिखाई देता है

मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि धर्म की सबसे बड़ी प्रभावना हमारा स्वयं का आचरण है। हम कितना भी धर्म सुन लें, पूजा-पाठ कर लें अथवा धार्मिक गतिविधियों में भाग ले लें, लेकिन यदि जीवन में क्रोध, मान, माया और लोभ कम नहीं होते तो धर्म का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। मुनिश्री ने कहा कि जिनवाणी को सुनने के बाद उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। हमारा व्यवहार, वाणी, विचार और कार्य यदि अहिंसा, संयम, सत्य और करुणा से प्रभावित होते हैं तो यही समाज के लिए सबसे बड़ा धार्मिक संदेश है। व्यक्ति स्वयं सुधरेगा तो परिवार सुधरेगा, परिवार सुधरेगा तो समाज में धर्म की प्रभावना स्वतः बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि प्रभावना का अर्थ धर्म का दिखावा नहीं, बल्कि धर्म के प्रभाव को अपने जीवन में प्रकट करना है। इसलिए प्रत्येक श्रावक को रत्नत्रय की भावना रखते हुए ऐसा जीवन जीना चाहिए, जिससे स्वयं का आत्मकल्याण हो और दूसरों को भी धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले।