मुरैना। नगर के जैन उपासना स्थल में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज ने निर्विचिकित्सा अंग की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म और धर्मात्मा के प्रति मन में कभी घृणा, ग्लानि अथवा मात्सर्य का भाव नहीं रखना चाहिए। दूसरों की साधना, तप और धर्माराधना देखकर ईर्ष्या करने के स्थान पर उनके गुणों की अनुमोदना करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिसके भीतर गुणग्राहकता है, वही सच्चे अर्थों में धर्म की ओर आगे बढ़ता है। आचार्य श्री ने कहा कि कमल कीचड़ में खिलता है और पंक में उत्पन्न होने के कारण ही पंकज कहलाता है। इसी प्रकार मानव शरीर नश्वर और अपवित्र होते हुए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी शरीर के माध्यम से रत्नत्रय-सम्यक दर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक चरित्र की आराधना संभव है। इसलिए मानव शरीर को भोग का साधन नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और साधना का माध्यम समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो रत्नत्रयधारी साधक से मात्सर्य करता है, वह वास्तव में रत्नत्रय से प्रेम नहीं करता। केवल बाहरी संयम, धार्मिक वेश अथवा दिखावा पर्याप्त नहीं है। जब तक भीतर कषाय और ईर्ष्या विद्यमान हैं, तब तक आत्मशुद्धि अधूरी है। सम्यग्दृष्टि जीव किसी से घृणा नहीं करता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति में गुणों को देखने का प्रयास करता है।

दोष नहीं, गुण देखने की हो दृष्टि

आचार्य श्री ने बलभद्र के प्रसंग के माध्यम से गुणग्राही दृष्टि का महत्व समझाते हुए कहा कि बलभद्र ने कुत्ते के दांतों में भी गुण देख लिया। इससे हमें सीख मिलती है कि हमारी दृष्टि दोष ग्राही नहीं, बल्कि गुणग्राही होनी चाहिए। संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई गुण अवश्य होता है। आवश्यकता उस गुण को पहचानने की है। उन्होंने मिठाई और दोने का उदाहरण देते हुए कहा कि मिठाई समाप्त होते ही जिस दोने को लोग महत्वपूर्ण समझ रहे थे, वही दोना कचरे में फेंक दिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि वास्तविक महत्व बाहरी आवरण का नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद वस्तु और गुण का होता है।

गुण ग्राहकता का भाव जागृत होता है

शायर मिर्जा गालिब के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बाहरी वेशभूषा के मोह पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य की पहचान उसके वस्त्र, रूप अथवा बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि उसके गुण, चरित्र और आचरण से होती है। बाहरी आवरण के कारण मिलने वाला सम्मान वास्तविक सम्मान नहीं कहा जा सकता। आचार्य श्री ने कहा कि निर्विचिकित्सा का अर्थ केवल घृणा का त्याग करना नहीं है, बल्कि धर्म, धर्मात्मा और धर्म के साधनों के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम रखना तथा दूसरों के गुणों की अनुमोदना करना भी है। जब मन से ईर्ष्या, घृणा और मात्सर्य समाप्त होकर गुण ग्राहकता का भाव जागृत होता है, तभी धर्म जीवन में प्रभावी रूप से उतरता है।

मोह को कम करने से जीवन में आती है शांति

धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि भगवान महावीर ने बाहरी विजय से अधिक आत्मविजय को महत्व दिया। जिसने अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली, उसने बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया। जिसने लोभ को नियंत्रित कर लिया, उसने संसार की बड़ी संपत्ति प्राप्त कर ली। जिसने मोह को कम कर लिया, उसके जीवन में शांति आने लगी। और जिसने आत्मा के स्वरूप को जान लिया, उसके लिए संसार के आकर्षण फीके पड़ने लगे। आत्मचिंतन से जीवन में वैराग्य और विवेक का जन्म होता है। यदि मनुष्य ने यह समझ लिया कि संसार का सुख केवल प्रतिबिंब है और वास्तविक सुख आत्मा में है, तो उसकी दौड़ समाप्त होने लगेगी। फिर वह धन कमाएगा, लेकिन धन को अपना स्वामी नहीं बनाएगा; परिवार में रहेगा, लेकिन मोह में नहीं डूबेगा, सम्मान मिलेगा तो अहंकार नहीं करेगा और अपमान मिलेगा तो टूटेगा नहीं।

आत्मकल्याण और गुणग्राही दृष्टि अपनाने का संकल्प लिया

धर्मसभा का संचालन विद्वत् नवनीत जैन शास्त्री, मुरैना ने किया। उन्होंने प्रवचन के प्रसंगों को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करते हुए श्रद्धालुओं को विषय से जोड़े रखा। मंगलाचरण नीलेश जैन, सागर ने किया। चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन सम्मानीयजनों द्वारा किया गया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजजन उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री के प्रेरणादायी प्रवचन का श्रवण कर आत्मकल्याण और गुणग्राही दृष्टि अपनाने का संकल्प लिया।