धरियावद। 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के दौरान प्रवचन करते हुए आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने अर्हत भक्ति भावना का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि भगवान की सच्ची भक्ति वही है, जिसमें श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के साथ भक्त के प्राण जुड़ जाएं। ऐसी भक्ति जीवन की दिशा बदलने के साथ आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। संकट के समय जिनेंद्र भगवान के चरणों में ही श्रद्धा और विश्वास के साथ टिके रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान के सामने जाकर नौकरी, धन-दौलत या सांसारिक सुख मांगने के बजाय उनके गुणों की प्राप्ति की भावना करनी चाहिए। याचना में हाथ फैलते हैं, जबकि प्रार्थना में हृदय और प्राण जुड़ते हैं। जब प्रार्थना में प्राणों का समर्पण होता है, तब जीवन में वास्तविक परिवर्तन दिखाई देता है।

सांसारिक वैभव नहीं, आत्म-संपदा चाहि

आचार्यश्री ने कहा कि संसार का वैभव नाशवान और क्षणभंगुर है। मनुष्य ने धन-दौलत और सुख-सुविधाएं अनेक बार प्राप्त की हैं, लेकिन आत्मा की अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान और अनंत सुख की संपदा अभी प्राप्त नहीं की। इसलिए भगवान के मंदिर में जाकर सांसारिक वस्तुओं की मांग करने के बजाय आत्मिक संपदा की प्राप्ति की भावना करनी चाहिए।

300 सीढ़ियों की कहानी में छिपा बड़ा संदेश

प्रवचन में आचार्यश्री ने तीन मित्रों की प्रेरक कथा सुनाते हुए कहा कि तीनों को 300 सीढ़ियां चढ़नी थीं। उन्होंने तय किया कि रास्ते में कहानी सुनाते हुए सीढ़ियां चढ़ेंगे। दो मित्रों ने अपनी कहानी पूरी कर सीढ़ियां पार कर लीं, लेकिन तीसरे मित्र ने अंतिम समय बताया कि कमरे की चाबी नीचे ही भूल आया है। उसे फिर नीचे लौटना पड़ा।

आचार्यश्री ने कहा कि हमारी स्थिति भी ऐसी ही है। हम मोक्ष के द्वार तक पहुंचने का प्रयास तो कर रहे हैं, लेकिन भक्ति रूपी चाबी साथ लेकर नहीं चले। इसलिए बार-बार संसार में लौटना पड़ता है। जिस प्रकार मोबाइल और टीवी आज जीवन का हिस्सा बन गए हैं, उसी प्रकार भक्ति को भी जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा।

स्तवन केवल परंपरा न हो, आत्मकल्याण का साधन बनें

उन्होंने कहा कि सीता, द्रौपदी, मीरा, अंजना, मेनासुंदरी सहित अनेक भक्तों ने भक्ति को जीवन का आधार बनाकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। प्रत्येक श्रावक-श्राविका को अर्हत भक्ति को जीवन में उतारना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि अर्हत भक्ति भावना तीर्थंकर प्रकृति के बंध का कारण कही गई है। इसलिए जिनेंद्र भगवान की भक्ति, स्मरण, पूजा और स्तवन केवल परंपरा न होकर आत्मकल्याण का साधन बनें। भक्ति के माध्यम से सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र की दिशा में आगे बढ़कर जीवन को सार्थक किया जा सकता है।