सागवाड़ा। सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य आचार्य श्री कनक नंदीजी गुरुदेव ने पुनर्वास कॉलोनी, सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में ‘स्वाध्याय युक्तता से लाभ’ विषय पर मंगलिक प्रवचन दिया। उन्होंने स्वाध्याय के आध्यात्मिक महत्व को समझाते हुए कहा कि विनयपूर्वक स्वाध्याय करने से साधक इंद्रियों को संकुचित कर तीन गुप्तियों से युक्त एवं एकाग्रचित्त हो जाता है।

विनयपूर्वक स्वाध्याय से एकाग्रता

आचार्यश्री ने कहा कि दर्शन, विनय आदि से संयुक्त मुनि उत्तम शास्त्रों का अभ्यास और वाचना आदि करते हुए पंचेंद्रियों को संवृत कर लेते हैं। तीन गुप्तियों से युक्त होकर एकाग्रचित्त अवस्था में ध्यान के लिए तत्पर हो जाते हैं। इसलिए स्वाध्याय चारित्र प्रधान है, क्योंकि इसके माध्यम से साधक मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि विनयपूर्वक स्वाध्याय करते समय इंद्रियों तथा मन, वचन और काय का व्यापार अन्यत्र नहीं जाता, बल्कि उसी विषय में तन्मय हो जाता है। इससे एकाग्र चिंतन और निरोध रूप ध्यान का लक्षण घटित होता है। इसी कारण स्वाध्याय को मुक्ति का कारण बताया गया है।

स्वाध्याय परम तप है

आचार्यश्री ने कहा कि तीर्थंकरों एवं गणधर आदि देवों द्वारा वर्णित तप के बाह्य और अभ्यंतर छह-छह भेद अर्थात कुल 12 प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान अन्य कोई तप नहीं है और न होगा। इसलिए स्वाध्याय को परम तप समझकर निरंतर उसकी भावना करनी चाहिए।

श्रुत ज्ञान प्रमाद से बचाता है

आचार्यश्री ने स्वाध्याय की भावना को श्रुत भावना से जोड़ते हुए उदाहरण दिया कि “जैसे धागे सहित सुई प्रमाद दोष से भी खोती नहीं है, वैसे ही श्रुत ज्ञान से युक्त पुरुष प्रमाद दोष से भी नष्ट नहीं होता।”

उन्होंने समझाया कि लोहे से बनी सुई सूक्ष्म होने के बावजूद यदि धागे में पिरोई हुई है तो उसके खोने की संभावना कम रहती है। यदि वह प्रमादवश कूड़े-कचरे में भी गिर जाए तो धागे के कारण उसे खोजा जा सकता है। इसी प्रकार श्रुत ज्ञान से समन्वित साधु भी प्रमाद के कारण संसार रूपी गर्त में नहीं गिरता।

निरंतर स्वाध्याय से कर्मक्षय

आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई साधु परम तप करने में समर्थ नहीं है, लेकिन शठता रहित होकर निरंतर स्वाध्याय करता है तो वह कर्मों के क्षय की दिशा में आगे बढ़ सकता है। स्वाध्याय साधक को आत्मचिंतन, एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।

मुनिश्री सुविज्ञ सागरजी ने किया मंगलाचरण

कार्यक्रम में मुनिश्री सुविज्ञ सागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता के माध्यम से मंगलाचरण किया—

“करुणा के सागर, ज्ञान दिवाकर, विश्व गुरु अवतार,

जय जयकार, जय जयकार, जय जयकार।”

इसके बाद उन्होंने सोलह भावनाओं की आध्यात्मिक प्रेरणा को कविता के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए कहा—

“सोलह भावना प्रभु ने बोया था,

जिसका फूल अभी तो खिला है,

महके सारा संसार,

जय जयकार, जय जयकार।”

स्वाध्याय को जीवन का अंग बनाने की प्रेरणा

मांगलिक प्रवचन में स्वाध्याय को केवल शास्त्रों के अध्ययन तक सीमित न मानकर आत्मशुद्धि, एकाग्रता और मुक्ति के मार्ग का महत्वपूर्ण साधन बताया गया। श्रद्धालुओं को विनयपूर्वक निरंतर स्वाध्याय करते हुए श्रुत ज्ञान की भावना को जीवन में उतारने की प्रेरणा दी गई।