जय हिंद! जय भारत! जय जिनेंद्र!

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस का यह गौरवशाली अवसर केवल राष्ट्रीय उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात विभूतियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है, जिन्होंने अपने त्याग, तप, संघर्ष और विचारों से भारत की स्वतंत्रता का स्वर्णिम इतिहास रचा। इन विभूतियों में जैन समाज, जैन पत्र-पत्रिकाओं और जैन पत्रकारों का योगदान भी महत्त्वपूर्ण, प्रेरणादायी और ऐतिहासिक रहा है, जिसका समुचित स्मरण आज भी अपेक्षित है।

जैन धर्म भारतीय संस्कृति की उन प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं में से है, जिसने मानवता को अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, सत्य और करुणा जैसे सार्वकालिक जीवन-मूल्य प्रदान किए। जैन दर्शन केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का बोध भी कराता है। भारतभूमि जैन धर्म की जन्मभूमि, तपोभूमि और मोक्षभूमि रही है। सभी 24 तीर्थंकरों का जीवन, उनका तप, उपदेश और निर्वाण इस पुण्यभूमि से जुड़ा रहा है। इसलिए जैन समाज की राष्ट्रनिष्ठा भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता से अभिन्न रूप से जुड़ी रही है।

इतिहास साक्षी है कि जैन समाज ने कभी राष्ट्रहित से विमुख होने का मार्ग नहीं अपनाया। जब-जब भारत की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्मिता पर संकट आया, तब-तब जैन समाज ने अपने ज्ञान, धन, श्रम और संगठन-शक्ति के माध्यम से राष्ट्र की सेवा की। भारत की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक गौरव की रक्षा को उसने अपने सामाजिक एवं नैतिक दायित्व का हिस्सा माना।

पत्रकारिता बनी राष्ट्रचेतना की आवाज़

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवारों और रणभूमि का संघर्ष नहीं था; यह विचारों, शब्दों और जनचेतना का भी महान आंदोलन था। इस वैचारिक संघर्ष में पत्रकारिता ने राष्ट्रीय चेतना के वाहक के रूप में अद्वितीय भूमिका निभाई। जैन पत्रकारिता ने भी इस राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन करते हुए स्वतंत्रता, स्वदेशी, सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय एकता के विचारों को जन-जन तक पहुँचाया।

जैन गजट, जैन मित्र, जैन प्रदीप, जैन महिलादर्श, जैन संदेश, तरुण ओसवाल, ओसवाल नवयुवक, वीर, सत्योदय, दिगंबर जैन, श्वेतांबर जैन, जैन हितैषी, जैन मार्तंड, ज्ञानप्रकाशक, जैन प्रकाशक, नारी हितकारी, जैन प्रचारक, जैन पथ प्रदर्शक, जातिप्रबोधक तथा वीर भारत जैसी पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय चेतना के निर्माण और प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन पत्रों ने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया, स्वतंत्रता के विचारों को जनसामान्य तक पहुँचाया, राष्ट्रीय नेताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व से पाठकों को परिचित कराया तथा भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय गौरव का प्रभावी प्रचार किया।

प्रतिबंधों के बीच भी नहीं रुकी कलम

ब्रिटिश शासन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए प्रेस पर अनेक कठोर प्रतिबंध लगाए। इसके बावजूद सत्य और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्ध पत्रकारों का साहस विचलित नहीं हुआ।

देवबंद से प्रकाशित उर्दू पत्र ‘जैन प्रदीप’ के संपादक श्री ज्योतिप्रसाद जैन ने अपने लेखन के माध्यम से भगवान महावीर के अहिंसा-दर्शन और महात्मा गांधी के सत्याग्रह के बीच एक वैचारिक सेतु स्थापित करने का प्रयास किया। उनका लेख ‘भगवान महावीर और महात्मा गांधी’ स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है।

यह उस दौर की पत्रकारिता का परिचायक है, जब समाचार प्रकाशित करना मात्र पेशा नहीं था, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति एक जिम्मेदारी थी। कलम विचारों का हथियार थी और पत्रकारिता जनजागरण का माध्यम।

जैन पत्रकारों ने बनाया लेखनी को राष्ट्रसेवा का माध्यम

जैन पत्रकारों और साहित्यकारों ने अपनी लेखनी को राष्ट्रसेवा का व्रत बनाया। ब्रह्मचारी शीतल प्रसाद, पं. परमेष्ठीदास, श्री ज्योतिप्रसाद जैन, पं. चैनसुखदास न्यायतीर्थ, श्री ऋषभचरण जैन, श्री जैनेन्द्र कुमार, श्री यशपाल जैन, श्री अक्षय कुमार जैन, श्री शांतिस्वरूप जैन ‘कुसुम’, श्री भगवत्स्वरूप जैन तथा श्री आनंदप्रकाश जैसे विद्वानों ने अपनी ओजस्वी रचनाओं के माध्यम से स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना की भावना को जन-जन तक पहुँचाने में योगदान दिया।

अनेक पत्रकारों और लेखकों ने निर्भीक लेखन के कारण कारावास का दंड भी सहा, किंतु राष्ट्रहित और सत्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से समझौता नहीं किया। उनकी पत्रकारिता ने यह सिद्ध किया कि जब कलम सत्य और राष्ट्रहित के लिए उठती है, तो वह समाज में व्यापक परिवर्तन की प्रेरणा बन सकती है।

जैनमित्र’ : पत्रकारिता से राष्ट्रनिर्माण तक

सन 1900 से निरंतर प्रकाशित ‘जैनमित्र’ ने जैन पत्रकारिता और राष्ट्रीय पत्रकारिता के इतिहास में विशिष्ट स्थान बनाया। इसके संपादक पं. परमेष्ठीदास स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी थे। उनके संपादकीय और कविताओं में देशभक्ति, राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता की प्रबल भावना दिखाई देती थी।

‘जैनमित्र’ जैसे प्रकाशनों ने यह स्पष्ट किया कि पत्रकारिता केवल घटनाओं और समाचारों का संकलन नहीं है। वह समाज के विचारों को दिशा देने, जनमत तैयार करने और राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण का प्रभावी माध्यम भी है।

महावीर से गांधी तक : विचारों की एक यात्रा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रेस ने जनमत तैयार किया, राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनांदोलन का स्वरूप देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस ऐतिहासिक दायित्व के निर्वहन में जैन पत्रकारिता का योगदान भी स्मरणीय है।

जैन पत्रकारिता ने भगवान महावीर के अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और करुणा के संदेश को आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना से जोड़ने का प्रयास किया। महात्मा गांधी के सत्याग्रह और स्वदेशी जैसे आंदोलनों में अहिंसा और नैतिक शक्ति की जो भूमिका रही, उसे जैन चिंतन के संदर्भ में भी देखा गया। इस प्रकार जैन पत्रकारिता ने धर्म, समाज और राष्ट्र के बीच एक सार्थक वैचारिक संवाद स्थापित किया।

आज भी प्रासंगिक है उनकी पत्रकारिता

आज स्वतंत्र भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन निर्भीक जैन पत्रकारों, संपादकों और पत्र-पत्रिकाओं का स्मरण करना हमारी राष्ट्रीय कृतज्ञता का प्रतीक है। उनका जीवन और लेखन आज की पत्रकारिता के लिए भी प्रेरणास्रोत है।

उनके आदर्श हमें यह संदेश देते हैं कि सच्ची पत्रकारिता केवल सत्ता की प्रशंसा या घटनाओं के विवरण तक सीमित नहीं होती; वह सत्य, समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी नैतिक प्रतिबद्धता का निर्भीक निर्वहन करती है।

आज जब पत्रकारिता तकनीक और डिजिटल माध्यमों के नए युग में प्रवेश कर चुकी है, तब स्वतंत्रता संग्राम के उन पत्रकारों की निर्भीकता, वैचारिक प्रतिबद्धता और राष्ट्रनिष्ठा को याद करना और भी आवश्यक हो जाता है। उनके संघर्ष हमें यह प्रेरणा देते हैं कि माध्यम बदल सकते हैं, तकनीक बदल सकती है, लेकिन पत्रकारिता का मूल धर्म—सत्य, जनहित और राष्ट्रहित—सदैव सर्वोपरि रहना चाहिए।

संदर्भ हेतु

विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए लेखक की प्रकाशित कृति “भारतीय संस्कृति में जैन पत्रकारिता : जैन पत्र-पत्रिकाओं एवं जैन पत्रकारों का योगदान एवं प्रभाव” का अध्ययन किया जा सकता है।