श्रीफल की 20 साल की यात्रा धर्म, समाज और संस्कारों के पुनर्जागरण का अभियान है, जो मुनि पूज्यसागर महाराज के विज़न और सेवाभाव से फलित हुआ। संपादक रेखा संजय जैन की कलम से......

16 नवंबर 2005—

एक युवा ब्रह्मचारी चक्रेश जैन ने एक सपना देखा था।

एक ऐसा मंच, जहाँ धर्म केवल पढ़ाया न जाए, बल्कि जिया जाए।

जहाँ संस्कृति केवल कही न जाए, बल्कि पीढ़ियों तक संजोकर पहुँचाई जाए।

और इसी सोच से जन्म हुआ— ‘श्रीफल’ का

आज, 16 नवंबर 2025—

श्रीफल अपनी 20 वर्ष की तप, त्याग और निरंतर कर्मयात्रा का स्वर्ण अध्याय पूरा कर चुका है।

ये दो दशक केवल पत्रकारिता का सफर नहीं…

बल्कि धर्म, समाज और संस्कारों के पुनर्जागरण का आंदोलन बन चुके हैं।

इस आंदोलन के केंद्र में हैं—

अंतर्मुखी, तेजस्वी और दूरदर्शी मुनि श्री पूज्यसागर महाराज,

जो कभी ब्रह्मचारी चक्रेश जैन के रूप में श्रीफल के संस्थापक थे,

और आज धर्म व समाज को नई दिशा देने वाले प्रेरक संत हैं।

3 जुलाई 1980, पिपलगोन में जन्मे मुनिश्री का जीवन बचपन से करुणा और संवेदनाओं से भरपूर रहा।

आर्यिका वर्धितमती माताजी के सान्निध्य में वैराग्य का बीज अंकुरित हुआ,

और 2015 में दीक्षा लेकर वे मुनि पूज्यसागर जी बने।

श्रवणबेलगोला में भट्टारक स्वस्तिश्री चारुकीर्ति जी से तत्वज्ञान, वास्तु और ज्योतिष का गहन अध्ययन—

यही श्रीफल की बौद्धिक, आध्यात्मिक और वैचारिक नींव बना।

श्रीफल का मिशन

समाज को जोड़ना…

धर्म को आधुनिक माध्यमों से प्रस्तुत करना…

और युवा पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ना।

इसी सोच से जन्म लिए—

अक्षर कलश, संस्कार यात्रा, ज्ञानामृतम्, श्रीफल पत्रकारिता पुरस्कार, श्रीफल परिवार जैसी पहलें,

जो आज हजारों जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बनी हैं।

गुरुदेव का विज़न

मीडिया हाउस

समाधान केंद्र

संस्कार पाठशालाएँ

चौका-वृक्ष अभियान

आदर्श ग्राम

स्वरोजगार प्रेरणा

—इन दस सूत्रों पर आधारित यह दिशा देशभर में श्रीफल के माध्यम से प्रभाव विस्तार कर रही है।

मेरे लिए भी श्रीफल केवल एक संस्था नहीं,

बल्कि आत्म-विकास का मार्गदर्शक रहा है।

गुरुदेव की कृपा से जो आत्मविश्वास मिला—

वह शब्दों में बयां करना कठिन है।

जीवन पहले परिवार और ऑफिस तक सीमित था…

श्रीफल और गुरुदेव ने सोच बदली, दृष्टि बदली और जीवन का उद्देश्य भी।

आज जब श्रीफल 20 वर्ष पूरे कर रहा है,

तो यह सिर्फ एक संस्था का उत्सव नहीं,

बल्कि एक संत के महान विचार की विजय है।

एक आंदोलन की निरंतरता है।

और प्रमाण है कि—

जब सेवा, साधना और समर्पण एक दिशा में चलें,

तो समाज भी बदलता है और पीढ़ियाँ भी।

श्रीफल

एक संत का स्वप्न,

एक समाज का संकल्प,

और आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों का आधार।